ऐतिहासिक बाधाओं के बावजूद डीयू ने किया अपने दायरे और प्रभाव का लगातार विस्तार: प्रो. योगेश सिंह

asiakhabar.com | September 20, 2025 | 5:28 pm IST

नई दिल्ली।दिल्ली विश्वविद्यायल के कुलपति, प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि अपने आरंभिक समय में धन और पदाधिकारियों की ऐतिहासिक बाधाओं के बावजूद, दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने दायरे और प्रभाव का लगातार विस्तार किया है। विश्वविद्यालय को मिलने वाला वार्षिक सरकारी अनुदान, जो 1922 में केवल 25,000 रुपए था, चालू वित्त वर्ष में वह बढ़कर 1,000 करोड़ रुपए से अधिक हो गया है। यह दिल्ली विश्वविद्यालय के विकास और राष्ट्र के उस पर विश्वास का प्रतीक है। प्रो. योगेश सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय के कान्वेंशन हाल में आयोजित पुस्तक लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए बोल रहे थे। इस अवसर पर डीयू के इतिहास विभाग की प्रोफेसर मनीषा चौधरी द्वारा लिखित पुस्तक “द यूनिवर्सिटी ऑफ दिल्ली-ए कोम्प्रहेंसिव अकाउंट ऑफ इट्स रिलायंस, नॉलेज, लीडरशिप एंड ग्रोथ” का औपचारिक लोकार्पण किया।
पुस्तक विमोचन समारोह में कुलपति प्रो. योगेश सिंह सहित राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के फेलो और सीएसआईआर-एनआईएसटीएडीएस के पूर्व निदेशक प्रो. अशोक जैन, प्रख्यात लेखिका एवं जयपुर साहित्य महोत्सव की सह-संस्थापक एवं सह-निदेशक डॉ. नमिता गोखले, डीयू साउथ कैंपस की निदेशक प्रो. रजनी अब्बी, डीन ऑफ कॉलेजेज प्रो. बलराम पाणि, डीयू रजिस्ट्रार डॉ. विकास गुप्ता, डीयू सांस्कृतिक परिषद के चेयर पर्सन एवं पीआरओ अनूप लाठर, पुस्तक की लेखक प्रो. मनीषा चौधरी, प्राइमस बुक्स के डिप्टी हेड डॉ. प्रसून चटर्जी सहित अनेकों प्रख्यात विद्वान, लेखक और विद्यार्थी उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम के दौरान एक पैनल चर्चा का भी आयोजन किया गया जिसमें प्रख्यात विद्वानों, प्रशासकों, लेखकों और छात्रों ने दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास, चुनौतियों और उपलब्धियों पर विचार-विमर्श किया।
डीयू कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने प्रो. मनीषा चौधरी को उनके कार्य के लिए बधाई देते हुए पुस्तक के विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। कुलपति ने संस्थागत चुनौतियों, विशेष रूप से टकराव, कुप्रबंधन और संसाधनों के कम उपयोग जैसे मुद्दों से निपटने में नेतृत्व की भूमिका के बारे में बात की। प्रो. योगेश सिंह ने शैक्षणिक क्षेत्र से परे दिल्ली विश्वविद्यालय के योगदान पर ज़ोर देते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्रता के बाद के भारत में देशभक्ति के मूल्यों को पोषित और प्रोत्साहित करने में डीयू की भूमिका बहुत सराहनीय रही है।
पैनल चर्चा के दौरान प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर अशोक जैन ने इस बात पर प्रकाश डाला कि विश्वविद्यालय ने अपनी स्थापना के बाद से ही विज्ञान और प्रयोगों पर ज़ोर दिया है। उन्होंने बताया कि अपने शुरुआती वर्षों में, दिल्ली विश्वविद्यालय ने क्वांटम भौतिकी, खगोल भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी। उन्होंने बताया कि यह वैज्ञानिक भावना बाद के दशकों में भी जारी रही, जिसका प्रमाण 1997 में सूचना विज्ञान और संचार संस्थान की स्थापना जैसी ऐतिहासिक पहलों से मिलता है, जिसने सूचना विज्ञान और संचार के उभरते क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया।
प्रख्यात लेखिका डॉ. नमिता गोखले ने दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ अपने लंबे जुड़ाव के बारे में निजी बातें सामने रखी। उन्होंने इस संस्थान को उन्हें जीवन भर सीखने वाला बनाने और अपने पूरे करियर में एक छात्रा जैसी जिज्ञासा बनाए रखने की क्षमता देने का श्रेय दिया। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे विश्वविद्यालय ने उनकी बौद्धिक नींव और एक लेखिका के रूप में उनके दृष्टिकोण को आकार दिया।
समारोह के आरंभ में अपने स्वागत भाषण में रजिस्ट्रार डॉ. विकास गुप्ता ने प्रोफेसर मनीषा चौधरी और उनके श्रमसाध्य शोध की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने विश्वविद्यालय के इतिहास का एक व्यापक विवरण प्रस्तुत करने के लिए बिखरी हुई ऐतिहासिक सामग्री का सूक्ष्म उपयोग किया है। रजिस्ट्रार ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यह पुस्तक केवल एक वृत्तांत नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण अकादमिक योगदान है जो पिछली शताब्दी में विश्वविद्यालय के विकास, लचीलेपन और नेतृत्व को दर्शाती है।
पुस्तक की लेखक प्रो. मनीषा चौधरी ने पुस्तक लेखन के पीछे की प्रेरणा और अभिलेखीय सामग्री को एकत्रित करने और उसकी व्याख्या करने की चुनौतियों के बारे में चर्चा की। उन्होंने विश्वविद्यालय की पहचान को आकार देने में शैक्षणिक और प्रशासनिक नेतृत्व दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस पुस्तक में विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति, हरि सिंह गौर (1922-1926) से लेकर वर्तमान कुलपति, प्रो. योगेश सिंह तक के सफर का वर्णन किया गया है और इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि कैसे उत्तरोत्तर नेतृत्व ने बाधाओं और अवसरों का सामना किया। उन्होंने विश्वविद्यालय, इसके घटक महाविद्यालयों और स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग तथा गैर-कॉलेजिएट महिला शिक्षा बोर्ड जैसी अन्य संस्थाओं की स्थापना के मूल विचारों, प्रक्रियाओं और संघर्षों पर भी प्रकाश डाला।
पुस्तक के प्रकाशक प्राइमस बुक्स की ओर से डॉ. प्रसून चटर्जी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए पुस्तक परियोजना को साकार करने के लिए अपनाए गए दृष्टिकोण और सहयोगात्मक प्रयास को साझा किया। उन्होंने प्रो. मनीषा चौधरी के समर्पण की सराहना की और भारत के संस्थागत इतिहास का दस्तावेजीकरण करने वाली कृतियों को सहयोग देने के लिए प्रकाशक की प्रतिबद्धता व्यक्त की। पैनल चर्चा के बाद, एक रोचक प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन हुआ जिसमें छात्रों, प्रोफ़ेसरों और अन्य उपस्थित लोगों ने प्रोफ़ेसर मनीषा चौधरी के साथ पुस्तक और इसकी सामग्री को लेकर बातचीत की। लेखिका ने उनके प्रश्नों के उत्तर दिए और पुस्तक के विषय, अपनी शोध पद्धति और एक व्यापक संस्थागत इतिहास लेखन की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की।


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