
डा सीमा विजयवर्गीय
अलवर राजस्थान
चाँद, सूरज, दीप बनकर हर घड़ी लड़ती रही
इन अँधेरों से सदा ये रोशनी लड़ती रही
पर्वतों का, घाटियों का, साथ तो छूटा मगर
सागरों के पास जाने तक नदी लड़ती रही
दर्द तो देकर गए सच्चाइयों के रास्ते
झूठ से फिर भी पिता की सादगी लड़ती रही
पर उसे मिल ही न पाई एक चाहत की नज़र
प्रेम की चाहत में चाहत बावरी लड़ती रही
छोड़कर पल्ला जो आगे बढ़ गई शृंगार का
फिर समय को धार देकर शायरी लड़ती रही
था बहुत संघर्ष लेकिन, दसमुखों के सामने
राम के दिल में जली वो रोशनी लड़ती रही
इक समस्या ख़त्म होती दूसरी थी सामने
आख़िरी दम तक यूँ ही बस ज़िंदगी लड़ती रही
