हरेक राही रहा निज फ़ितरत

asiakhabar.com | September 24, 2025 | 4:24 pm IST
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गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
हरेक राही रहा निज फ़ितरत,
कहाँ फुर्सत रही लखा हसरत;
रहा करता सदा ही वह हरकत,
हिमाक़त किसकी जाना ना विचरत!
जान ना पाया किसकी थी ताक़त,
उसकी औक़ात किसी की दौलत;
पड़ीं जो लत थीं छूट कभी गईं,
बदलती नित गई थीं ख़ुद नीयत!
कहाँ तबियत हमेशा उम्दा रही,
नियति नाटक रचाये रोज रही;
बदलते पात्र रहे पात बने,
घात आघात कितने पर्दे बुने!
सुने कब कोई कहे कितने गए,
गान कितने बने न लिखे गए;
बजाए वेणु हर घड़ी वो रहा,
राधिका बनके कहाँ कोई सुना!
भेजा जो वो रहा था चित चितवत,
हेरा पर कहाँ जीव जग फिरबत;
हरि के डेरा में रहे ‘मधु’ थिरकत,
नचे नचवाये समा हर चितवन!


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