
डॉ वंदना घनश्याला
सुबह की कोमल हवा सहलाने लगी है
गुलाबी सी ठंडक आने लगी है
मेरे पास आकर मुझे छू लेती है
हल्के से कुछ गुनगुना कर चल देती है
मेरे कँगन को खन-खना कर भाग जाती है
कभी पायल के घुँघरू बजाती है
मुझे प्यार से गले लगा कर कुछ समझा जाती है
जब उठने का मन नहीं करता तो कानों में बुदबुदाती है
स्कूल की याद दिलाकर कमबख्त जगा जाती है
धीरे धीरे सर्दी की दस्तक जगाती है
पुरानी शॉल की गरमाहट अब भाती है
शायद किसी की याद दिलाती है
वह चाय की मिठास मन को भाती है
वो सुबह की चाय पुरानी याद दिलाती है
की ना होंगी इतनी बातें किसी से, वह सारी याद दिलाती है
गुलाबी दुपट्टे से यादें जुड़ जाती हैं
यह गुलाबी सी ठंडक मेरे मन को भाती है
तमाम खुशियों को मेरे आँचल में भर जाती है
धीरे धीरे सर्दी की दस्तक जगाती है
