ग्रेटर बांग्लादेश: कूटनीति के आवरण में छिपी रणनीतिक साजिश

asiakhabar.com | November 14, 2025 | 4:47 pm IST

डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र
25 अक्टूबर 2025 को बांग्लादेश के अंतरिम प्रमुख मुहम्मद यूनुस और पाकिस्तान की संयुक्त चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष जनरल साहिर शामशाद मिर्ज़ा की मुलाकात हुई। दोनों देशों के बीच यह संवाद ऐसे समय में हुआ जब 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद से तनावपूर्ण रहे बांग्लादेश–पाकिस्तान संबंधों में हाल के दिनों में सुधार के संकेत मिल रहे हैं। इसी दिन मुहम्मद यूनुस ने ढाका में जनरल मिर्ज़ा को “आर्ट ऑफ ट्रायम्फ: बांग्लादेश्स न्यू डॉन” नामक पुस्तक उपहार में स्वरूप दी। इस पुस्तक के आवरण पर बने नक्शे में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों असम, त्रिपुरा, मेघालय, मिज़ोरम, मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश को बांग्लादेश का हिस्सा दिखाया गया था, जिससे तीव्र विवाद खड़ा हो गया जिसने भारत और बांग्लादेश के बीच राजनयिक तनाव को गहरा कर दिया है। यूनुस ने अपनी इस मुलाकात की तस्वीरें अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर साझा कीं। इनमें एक तस्वीर में वे जनरल मिर्ज़ा को उक्त पुस्तक भेंट करते नजर आए। तस्वीर के सार्वजनिक होते ही सोशल मीडिया पर विवाद और आलोचना की लहर दौड़ गई। भारतीय विश्लेषकों और राजनीतिक नेताओं ने आरोप लगाया कि पुस्तक के कवर पर दर्शाया गया चित्र तथाकथित “ग्रेटर बांग्लादेश” की उग्र अवधारणा से मेल खाता है, जिसमें भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्रों को बांग्लादेश का अंग बताया जाता है।
गौरतलब है कि यह पहला अवसर नहीं है जब यूनुस ने भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को लेकर विवाद उत्पन्न किया हो। अप्रैल 2024 में अपने चीन दौरे के दौरान उन्होंने भारत के सात पूर्वोत्तर राज्यों को लैंड लॉक्ड स्टेट (भूमि आबद्ध राज्य ) बताते हुए कहा था कि बांग्लादेश इस क्षेत्र का “सागर का एकमात्र संरक्षक है। उन्होंने यह भी दावा किया था कि यह स्थिति चीन की आर्थिक विस्तार नीति के लिए “बड़ी संभावना” प्रस्तुत करती है। यद्यपि भारत ने इन टिप्पणियों पर कड़ा प्रतिकार व्यक्त किया। मई 2025 में यूनुस के करीबी माने जाने वाले सेवानिवृत्त मेजर जनरल फज़लुर रहमान ने कहा था कि “यदि भारत पाकिस्तान पर हमला करता है, तो बांग्लादेश को चीन के साथ मिलकर भारत के पूर्वोत्तर पर कब्ज़ा कर लेना चाहिए।” वहीं, 2024 में यूनुस के एक अन्य सहयोगी नाहिदुल इस्लाम ने सोशल मीडिया पर “ग्रेटर बांग्लादेश” का नक्शा साझा किया था, जिसमें पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम के कुछ हिस्सों को बांग्लादेश का भाग दिखाया गया था। इन सभी विवादों के बीच यूनुस ने लगातार मौन बनाए रखा है। अब सवाल यह उठता है कि इस मानचित्र के जरिए ढाँका क्या संकेत दे रहा है ? साथ ही एक प्रश्न यह भी उठता है कि विगत कुछ महीने में बांग्लादेश में पाकिस्तान, अमेरिका, तुर्की और चीन का प्रभाव बड़ी तेजी से बढ़ा है। इन देशों की यहाँ उपस्थिति किस बात की द्योतक है ? यह भी मूल प्रश्न है। इन प्रश्नों के उत्तर बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में निहित हैं। इस लिए इस पर दृष्टिपात करना आवश्यक है।
बांग्लादेश में जमात ए इस्लामी नाम का एक राजनीतिक दल है जिसे फिलहाल प्रतिबंधित किया गया परन्तु इसका एक छात्र संगठन जिसे ‘इस्लामी दान शिविर’ कहा जाता है। यह ढाँक विश्वविद्यालय में अभी भी सक्रिय है। यह निरन्तर छात्र कल्याण, साँस्कृतिक एवं सामाजिक संगठन के तौर पर कार्य करता रहा है भले ही यह राजनीति से दूर है,बावजूद इसके उसका चेहरा वही है जो शेख हसीना के 15 साल के कार्य काल के शुरुआती दौर में रहा अर्थात् भारत के खिलाफ साजिश रचना । ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए यह जामात ए इस्लामी वही दल है जो 1971 में बांग्लादेश की आजादी के विरुद्ध था। इसने बांग्लादेश के स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान पाकिस्तानी सेना का साथ दिया। 1971 में इसने राजकर, अल बदर और अल शम्सनामक स्वयंसेवी सशस्त्र बल बनाए थे जिन्होने पूर्वी पाकिस्तान में व्यापक रूप से नरसंहार किया। बांग्लादेश की आजादी के बाद यह भारत विरुद्ध और पाकिस्तान समर्थन के तौर पर काम करने लगा। 2001 से 2006 तक इसने बी.एन.पी. के साथ मिलकर शासन किया और उस दौरान बांग्लादेश आतंकवादी शिविरों का गढ़ बन गया और इस दौर में भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों में अपने प्रभाव कायम करने की कोशिश की। जब हसीना सरकार आई तो इनके ऊपर प्रतिबन्ध लगा। इसके बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्ते में काफी गर्माहट आ गई किन्तु बांग्लादेश की तथाकथित अगस्त क्रांति के बाद एक बार पुनः जमात सक्रिय हो गया। वस्तुतः जब हसीना के समय कोर्ट के द्वारा जब 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वालों के पाल्यों को15 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी तो वहाँ इसी का प्रतिकार किया गया और इसी का फायदा उठाते हुए ‘शिविर’ने विरोध कियाऔर शेख हसीना को सत्ता त्यागना पड़ा। इस सत्ता परिवर्तन में पाकिस्तान की आईएसआई , अमेरिका की सीआईएऔर टर्की की एजेंसी एमआईटी भी गुप्त रूप से सम्मिलित थीं ।
1 अगस्त 2024 को, यानी शेख हसीना के देश छोड़ने से चार दिन पहले, उनकी सरकार नेआतंकवाद विरोधी अधिनियम के तहत जमात-ए-इस्लामी और उसकी छात्र इकाई शिबिर पर औपचारिक प्रतिबंधलगा दिया था लेकिन 28 अगस्त 2024 को, अंतरिम प्रमुख मुहम्मद यूनुस ने यह प्रतिबंध हटा लिया, जिसके बाद जमात-ए-इस्लामी और शिबिर फिर से सक्रिय हो गए यानी वे राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में पुनः लौट आए। इसके बाद मुहम्मद यूनुस के “प्रत्यक्ष संरक्षण” में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसीआईएसआई (ISI) बांग्लादेश में सक्रिय हो गई। 21 जनवरी 2025 को आईएसआई के महानिदेशक एक सैन्य प्रतिनिधिमंडल के साथ ढाका पहुँचे थे, जहाँ उनका स्वागत बांग्लादेश की खुफिया एजेंसीडीजीएफआई (DGFI)ने किया। यह दौरा दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य और खुफिया सहयोग का संकेत देता है।
बांग्लादेश में आईएसआई और एमआईटी की बढ़ती गतिविधियों ने “ग्रेटर बांग्लादेश” की अवधारणा को सशक्त किया है। वस्तुतः यह रणनीति एक सुनियोजित बहु-चरणीय प्रक्रिया के रूप में सामने आती है। मसलन सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध प्रवासन, उच्च जन्मदर व समुदाय-निर्माण से जनसांख्यिकीय संतुलन बदलना, आईएसआई और एमआईटी जैसे खुफिया नेटवर्क स्थापित कर संचालन और समन्वय सुनिश्चित करना, स्थानीय अलगाववादी व उग्र गुटों को पुनर्जीवित कर प्रशिक्षण, वित्त और संसाधन उपलब्ध कराना, आर्थिक व सामाजिक शिकायतों को भुनाकर पृथक्करणवादी भावनाएँ भड़काना,हथियार, प्रशिक्षण और आश्रय देकर सशस्त्र अभियानों को सशक्त करना। इन चरणों का संयुक्त उद्देश्य सीमापार प्रभाव बनाकर अवधारणा को व्यवहारिक आधार प्रदान करना है।। ये ऐसे हालात है जो यह संकेत देते हैं कि पुस्तक कवर का विवाद केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि एक स्पष्टसंचालनात्मक संकेत (operational signaling)है।इन सबका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में अस्थिरता और प्रभाव कायम कर “ग्रेटर बांग्लादेश” की अवधारणा को व्यवहारिक आधार देना है।
औपचारिक तौर पर बांग्लादेश कुछ भी कहे बावजूद इसके अब प्रश्न यह नहीं कि साजिश मौजूद है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत इसकी गंभीरता को समय रहते पहचान पाएगा। इस दिशा में भारतीय थिंक टैंक को सोचना होगा। अब मार्च 2026 तक सक्रिय रूप से इंतजार करना होगा क्योंकि आगामी चुनाव के बाद हो सकता है कि आने वाली सरकार सकारात्मक कदम उठाए क्योंकि बांग्लादेश के आर्थिक और भू- राजनीतिक हालात बेहद संजीदा हैं। दक्षिण एशियाई खित्ते की तरक्की के लिए बांग्लादेश में स्थिर लोकतान्त्रिक एवं संवैधानिक मूल्यों वाली सरकार की सख्त आवश्यकता है। यह बांग्लादेशी अवाम की खुशहाली और भारतीय भू-राजनीति एवं भू-समरिकी के लिए बेहद जरूरी है।


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