मूल्य शिक्षा

asiakhabar.com | November 28, 2025 | 5:02 pm IST

डॉ. सुनील ‘सावन’
मूल्य शिक्षा। यह पूर्ण वाक्य है जिसमें दो शब्द हैं। दोनों शब्द स्वयं में पूर्ण हैं। इन दोनों शब्दों के बीच कारक का लोप है, जो इनके अर्थ को व्यापक बनाता है। जब बड़ी ध्यान से इन दोनों शब्दों को पढ़ेंगे तब हमें कई अर्थ प्राप्त होंगे। जैसे- जहां मूल्य है वहां शिक्षा है। मूल्य ही शिक्षा है। मूल्य में ही शिक्षा है। मूल्य के बिना शिक्षा का कोई अस्तित्व नहीं है। जहां-जहां मूल्य है वहां-वहां शिक्षा है। मूल्य और शिक्षा एक दूसरे के पूरक हैं। जहां शिक्षा है वहां मूल्य है। शिक्षा मूल्यवान होती है। मूल्यवान शिक्षा जीवन को सार्थक और सबल बनाती है। जब आप इन शब्दों की गहराई में उतरेंगे तब अर्थ के अनेक मोती और दिव्य ज्योति से लाभान्वित होंगे।
जब हमारे प्रबुद्ध प्राचार्य श्री उमेश जी ने मूल्य शिक्षा के संदर्भ में व्याख्यान देने के लिए हमें आदेशित किया तब हमारे मन में विचारों की उर्मियां उमड़ने लगीं। भाव भवसागर में डूबने- उतराने लगा। इस मंथन के पश्चात् मैंने पाया कि जहां मूल्य है वहां शिक्षा है और जहां शिक्षा है वहां मूल्य है। लेकिन और गहराई में उतरने पर समझ में आया कि जहां मूल्य नहीं है वहां भी मूल्य है।
इस गहराई को समझने से पहले हमें समझना होगा कि मूल्य क्या है और शिक्षा क्या है? मूल्य के दो अर्थ हैं-मान्यता और शक्ति। शिक्षा का अर्थ है- अंत:जगत और बाह्य जगत को अच्छे से जानना, समझना और सीखना। भौतिक वस्तुओं, जैसे- रूपया-पैसा, सोना, चांदी, इत्यादि में स्वयं का मूल्य नहीं होता है। हम उसे मूल्य प्रदान करते हैं, हम उसे मान्यता प्रदान करते हैं। किसी वस्तु की कमी भी उसे मूल्यवान बना देती है। एक नोट अथवा सिक्के को ज्यों ही अमान्य घोषित किया जाता है अर्थात् उसकी मान्यता को रद्द किया जाता है त्यों ही वह मूल्यहीन हो जाता है। इससे सिद्ध होता है कि कुछ वस्तुओं में स्वयं का मूल्य नहीं होता है। तभी तो हम उन्हें मूल्य प्रदान करते हैं। किसी वस्तु को मानना और जानना भी उसे मूल्यवान बनाता है। भाव देने से भाव बढ़ता है। कुछ वस्तुओं में स्वयं की शक्ति होती है जो इन्हें मूल्यवान बनाती है। जैसे- भूमि, गगन, वायु, अग्नि , नीर इत्यादि। इनकी शक्ति ही इनका मूल्य है। इन्हें मान्यता की कोई आवश्यकता नहीं है। इनको मानने और जानने से इनका नहीं अपितु हमारे जीवन का मूल्य बढ़ जाता है।
भाव, विचार और व्यवहार को भी मूल्य प्रदान किया जाता है। एक ही व्यवहार सर्वत्र मूल्यवान नहीं होता है। यह सृष्टि हमारी दृष्टि पर आधृत है। सबकी अपनी-अपनी दृष्टि है, अपनी-अपनी सृष्टि है, अपना-अपना मूल्य है।
मैंने पहले ही अपना भाव और विचार अभिव्यक्त किया है कि जहां मूल्य है वहां शिक्षा है और जहां शिक्षा है वहां मूल्य है लेकिन कहीं-कहीं इसका विरोध है और कहीं-कहीं विरोधाभास है। जैसे- भूमि में जीवन नहीं है लेकिन भूमि से ही जीवन है, यही इसका मूल्य है। गगन में जीवन का अस्तित्व नहीं है लेकिन गगन के बिना जीवन का कोई अस्तित्व नहीं है। वायु भी निर्जीव है क्योंकि उसमें ना वृद्धि होती है ना प्रजनन की क्षमता है लेकिन वायु के बिना वृद्धि और प्रजनन संभव है क्या? आग में जीवन नहीं है लेकिन आग से ही जीवन का राग है, यही इसका मूल्य है। पानी में जीवन की कहानी नहीं है लेकिन पानी के बिना जीवन की कोई कहानी नहीं है। यही पानी का मूल्य है और इस मूल्य को समझना ही शिक्षा है। पानी में बहुत से रहस्य हैं। यह रंगहीन होता है लेकिन जीवन के सारे रंग इसी में समाहित हैं। कुछ पल पानी न पीने पर चेहरे का रंग उतर जाता है और कुछ दिन पानी न पीने पर जीवन का रंग उतर जाता है। रंग को भी रंगीन बनाने के लिए रंगहीन पानी मिलाना पड़ता है। जो रंगहीन है उसी में रंग है। जो गंधहीन है उसी में गंध है। पानी से ही गुलाब में सुगंध है। पानी निराकार है लेकिन इसी से जग साकार है। यह रस और रहस्य हमें आकर्षित करता है। इस रहस्य में ही मूल्य है। इस रस में ही शिक्षा है।
मूल्य शिक्षा के विचारों में विचरण करते हुए मैंने पाया कि यह शरीर सजीव नहीं है। जब पंचतत्व सजीव नहीं है तो उनसे निर्मित शरीर सजीव कैसे हो सकता है? यह शरीर सजीव तब तक रहता है जब तक इसमें जीव रहता है। जीव को समझने के लिए दुनिया ने उसे आत्मा, प्राण, रूह इत्यादि संज्ञा से नवाजा है। यदि शरीर सजीव होता तो एक लाश को हम निर्जीव नहीं कहते। ज्यों ही जीव शरीर का साथ छोड़ता है त्यों ही वह शरीर सजीव नहीं रह जाता है। इससे सिद्ध होता है कि शरीर निर्जीव है। देह का अपना मूल्य है और रूह का अपना मूल्य है। मूर्त और अमूर्त शक्तियों के मिलन से ही यह सृष्टि सजीव है, मूल्यवान है। इस रहस्यमय मूल्य को समझना ही सच्ची शिक्षा है। इस मौलिक मूल्य को परखना ही मूल्य शिक्षा है। मूल्य शिक्षा जीवन को अमूल्य बनाती है।


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