
मोनिका डागा
धुंध की चादर ने डाल रखा है डेरा,
कड़ाके की ठंडी और घना है कोहरा,
हाथ को हाथ भी नहीं दिखता है यहॉं,
सूरज दादा तुम हो कहॉं बताओ ज़रा ।
इस सर्द मौसम ने बड़ा ही है सताया,
ऊपर से बारिश ने तापमान गिराया,
हवा भी चल रही जोर-शोर से यहॉं,
ठंडे बर्फीले पानी ने डर और बढ़ाया ।
कुछ तो रखो छोटे बच्चों का ख़्याल,
लाल-लाल हो गए हैं हमारे तो गाल,
गुलाबी होंठ भी हुए रूखे हमारे यहॉं,
शुष्क मौसम ने कैसी चली है चाल ।
सूरज दादा आओ न बीत गई रात,
पेड़ों से झर रहे हैं पीले-पीले पात,
चाहिए हमें “आनंद” गर्माहट यहॉं,
सुन लो हमारी भी थोड़ी सी बात ।
