
डॉ. प्रियंका सौरभ
मनुष्य सब कुछ बन जाता है,
पर मनुष्य ही रह न पाता,
दुनिया की इस भीड़ में अक्सर
खुद से ही दूर हो जाता।
रिश्तों में जब बात न कहिए,
तो गांठें गहरी हो जातीं,
सच अगर होंठों तक न पहुँचे,
तो गलतफहमियाँ पनप जातीं।
जो कहना हो, कह देना चाहिए,
सीधे-साफ़ हर बार,
पीठ पीछे जो बोलते रहते,
वही होते चाटुकार।
चुगली करने की आदत में,
चेहरे खोखले हो जाते,
ऊपर से जो बहुत उजले,
अंदर से खाली रह जाते।
जीवन ने इतना ही सिखलाया,
सच का बोझ ही काम आता,
जो जैसा है, वैसा रहकर
चला अकेला, ठोकर खाता।
