
डॉ. सत्यवान सौरभ
हे प्रभु!
जब हृदय को थाल बनाकर
मैंने विश्वास के दीप जलाए,
अपनों की राहों में
अपना सुख चुपचाप बिछाए—
तब भी जिन्होंने
मेरी आत्मा में दोष ही ढूँढे,
मेरे समर्पण में स्वार्थ की छाया आँकी,
मेरे मौन को कमजोरी समझा—
उनसे बस इतनी प्रार्थना है,
काल के अनंत विस्तार में
फिर कभी न हो आमना-सामना।
क्योंकि
प्रेम जब उपेक्षित होता है,
तो शिकायत नहीं करता—
बस भीतर ही भीतर
ईश्वर को सौंप देता है सब कुछ।
