
गोपाल बघेल ‘मधु’ टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा गुल खिलाई है ज़िंदगी कितने, दिल मिलाई है बंदगी कितने; खिल के आई है ख़्वाहिशी कितनी, खिलिखला कितनी गई ज़िंदादिली! मौत छूकर भी सिखा कितना गई, ज़िंदगी जीना फिर से सिखला गई; जीना मरना था जिनके हाथ रहा, जुड़वा ...आगे पढ़ें asiakhabar.com | March 23, 2023 | 11:58 am IST

