चौ. चरण सिंह मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ (उ. प्र.) की एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुआ प्रो. दिनेश चमोला ‘शैलेश’ का विशेष ‘समकालीन हिंदी साहित्य और सामांजिक सरोकार’ विषयक व्याख्यान

asiakhabar.com | March 19, 2026 | 3:48 pm IST
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मेरठ (उत्तर प्रदेश)। चौ. चरण सिंह मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ (उत्तर प्रदेश) द्वारा आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुआ साहित्य अकादमी के बाल साहित्य पुरस्कार विजेता, प्रख्यात साहित्यकार, प्रो. दिनेश चमोला ‘शैलेश’ का विशेष ‘ समकालीन हिंदी साहित्य और सामांजिक सरोकार’ विषयक धाराप्रवाह व्याख्यान संपन्न हुआ । प्रोफेसर चमोला को समापन सत्र में सत्राध्यक्ष के रूप में इस व्याख्यान हेतु आमंत्रित किया गया था ।
इसमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड सहित अन्य समीपवर्ती प्रदेशों के अनेक हिंदी विद्वान, प्रोफेसर,
सहायक प्रोफेसर, शोधार्थी व विद्यार्थी के सम्मिलित थे । अपने अध्यक्षीय उद्बोधन से पूर्व प्रो. चमोला ने अंतिम सत्र में पढ़े गए सात-आठ शोध पत्रों की विधिवत समीक्षा की । तदनंतर ‘समकालीन हिंदी साहित्य और सामांजिक सरोकार’ पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि समाज साहित्य के लिए उत्प्रेरण, साहित्य सृजन की अत्यंत प्रभावी व उर्वर भूमि रही है । जब भी तप, साधना, निष्ठा, ईमानदारी व मौलिकता से कोई साहित्य लिखा व सृजित होता रहेगा उसमें सामाजिक सरोकार स्वयं ही प्राण-प्रतिष्ठित होते रहेंगे । प्रायोजित साहित्य अथवा किसी लोभ, मोह या अनुग्रहपूर्वक लिखा व लिखवाया गया साहित्य कागज व प्लास्टिक के उन फूलों की तरह है जो संसार को दिग्भर्मित तो कर सकता है लेकिन आनंदित व सुगंधित नहीं । निष्ठा से लिखे गए साहित्य में चेतना के अंगारे सतत् धधकते रहते हैं…कभी न कभी, कोई न कोई पारखी आँखें उसके मूल्यांकन के लिए प्रकृति तैयार अवश्य करती है । साहित्य और सामाजिक सरोकारों पर विस्तृत व्याख्या वाला भावपूर्ण व्याख्यान देकर प्रो. चमोला ने उपस्थित विद्वानों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर उन्होंने प्रमुख हिंदी सेवी विद्वान प्रो. नरेश मिश्र के साथ डॉ. विजय विद्यालंकार की तीन पुस्तकों लोकार्पण भी किया ।
संगोष्ठी के आयोजक डॉ. ए. कुमार ने ऐसे क्रांतिकारी व उत्प्रेरक व्याख्यान की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसा व्याख्यान समापन सत्र में नहीं, बल्कि प्रारंभिक सत्रों में होना चाहिए था, प्रो. चमोला जी का ऐसा प्रभावी उद्बोधन था जिसे हम और हमारे शोधार्थी -विद्यार्थी जीवन भर याद रखेंगे ।
अंत में सभी विद्वान वक्ताओं, शोधार्थियों, शोधपत्र वाचकों व आयोजकों को प्रो. चमोला ने स्मृतिचिह्न, प्रमाणपत्र व मेडल भी वितरित किए ।
ध्यातव्य है 14 जनवरी, 1964 को उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम कौशलपुर में स्वर्गीय पं. चिंतामणि चमोला ज्योतिषी एवं माहेश्वरी देवी चमोला के घर में जन्मे प्रो. चमोला ने शिक्षा में प्राप्त कीर्तिमानों यथा एम.ए. अंग्रेजी, प्रभाकर; एम. ए. हिंदी (स्वर्ण पदक प्राप्त); पीएच-डी. तथा डी.लिट्. के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में भी
राष्ट्रव्यापी पहचान निर्मित की है। अभी तक प्रो. चमोला ने उपन्यास, कहानी, दोहा, कविता, एकांकी, बाल साहित्य, समीक्षा, शब्दकोश, अनुवाद, व्यंग्य, लघुकथा, साक्षात्कार, स्तंभ लेखन के साथ-साथ एवं साहित्य की विविध विधाओं में सात दर्जन से अधिक पुस्तकों में लेखन किया है । आपके व्यापक मौलिक साहित्य देश के अनेक विश्वविद्यालयों में पीएच-डी.तथा एम.फिल. स्तरीय कई शोध कार्य संपन्न हो चुके हैं तथा अनेक विश्वविद्यालयों में वर्तमान में चल रहे हैं ।
अभी तक अपनी उत्कृष्ट साहित्यिक सेवाओं के लिए आपको देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा ‘सहित्यश्री’, ‘साहित्य भास्कर’, ‘विद्यासागर’, ‘युवा साहित्यकार सम्मान’, ‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’, ‘उत्तरांचल रत्न सम्मान’ , ‘डॉ. गोविंद चातक सम्मान’, ‘उत्तराखंड शोध संस्थान सम्मान’, ‘बाल साहित्यकार सम्मान’ ‘संपादक शिरोमणि सम्मान’, ‘उत्कृष्ट बाल साहित्य पुरस्कार’, ‘हिंदी गौरव सम्मान’, ‘राष्ट्रीय राजभाषा शील्ड सम्मान’, ‘हिंदी भूषण सम्मान’, पंडित शिव शंकर दुबे स्मृति पुरस्कार’, ‘चंद्र कुंवर बर्त्वाल सम्मान’, ‘ परमार पुरस्कार’, तुरशन पाल पाठक बाल विज्ञान लेखन पुरस्कार’, ‘विवेकानंद सम्मान’, ‘राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान’,श्री श्याम सुधा परिमार्जन बाल साहित्य सम्मान’, ‘बाल साहित्य पुरस्कार’ (साहित्य अकादमी), ‘डॉ. राम जिनका किंकर सम्मान’, ‘डॉ. राष्ट्रबंधु सम्मान’ आदि अनेक सम्मान/पुरस्कार’ प्राप्त हुए हैं ।
आपकी चर्चित पुस्तकों में ‘यादों के खंडहर, ‘टुकडा-टुकड़ा संघर्ष, ‘प्रतिनिधि बाल कहानियां, ‘श्रेष्ठ बाल कहानियां, ‘दादी की कहानियां¸ नानी की कहानियां, माटी का कर्ज, ‘स्मृतियों का पहाड़, ‘क्षितिज के उस पार, ‘कि भोर हो गई, ‘कान्हा की बांसुरी, ’मिस्टर एम॰ डैनी एवं अन्य कहानियाँ,‘एक था रॉबिन, ‘पर्यावरण बचाओ, ‘नन्हे प्रकाशदीप’, ‘एक सौ एक बालगीत, ’मेरी इक्यावन बाल कहानियाँ, ‘बौगलु माटु त….,‘विदाई, ‘अनुवाद और अनुप्रयोग, ‘प्रयोजनमूलक प्रशासनिक हिंदी, ‘झूठ से लूट’, व मिट्टी का संसार’;’गायें गीत ज्ञान विज्ञान के’ ‘मेरी 51 विज्ञान कविताएँ’ तथा ‘व्यावहारिक राजभाषा शब्दकोश’ आदि प्रमुख हैं। आपके संपादन में प्रकाशित बहुचर्चित हिंदी पत्रिका ‘विकल्प’ ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने महत्वपूर्ण विशेषांकों के माध्यम से अपनी अलग पहचान अर्जित की है। डॉ॰ चमोला ने भारत सरकार में संयुक्त निदेशक (हिन्दी) सहित विभिन्न सरकारी पदों पर कार्य किया है तथा पूर्व में आप भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून में राजभाषा के प्रमुख रहे हैं तथा वर्तमान में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार में आधुनिक ज्ञान विज्ञान संकाय के पूर्व डीन, कुलानुशासक तथा भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान के अध्यक्ष रहे हैं । आप गढ़ विहार, फेज-1, देहरादून में रहते हैं ।
डॉ॰ चमोला ने देश के शताधिक विद्वानों के साक्षात्कार लिए हैं। अपने अनेक साक्षात्कार, रचनाओं का प्रसारण देश के 8 दूरदर्शन केंद्रों तथा 12 आकाशवाणी केंद्रों से प्रसारित हुए हैं । आप देश-विदेश की सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं के स्थापित लेखक हैं ।
आपके उपन्यास ‘टुकड़ा-टुकड़ा संघर्ष’ का कन्नड़ भाषा तथा अनेक रचनाओं का विभिन्न भारतीय देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद एवं प्रकाशन हुआ


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