
नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर नागरी लिपि का प्रचार प्रसार कर रही प्रतिनिधि संस्था नागरी लिपि परिषद,नई दिल्ली ने नाशिक, महाराष्ट्र के के टी एच एम महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में एक अंतरराष्ट्रीय नागरी लिपि संगोष्ठी का सफलतापूर्वक आयोजन किया। ‘ नागरी लिपि में वैश्विक लिपि बनने का सामर्थ्य ‘ विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता तमिल भाषी प्रख्यात भाषाविद डॉ वी आर जगन्नाथन ने की। के टी एच एम महाविद्यालय, नाशिक के उप प्राचार्य और हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ पोपट राव कोटमे के संयोजन एवं कुशल संचालन में इस संगोष्ठी का शुभारंभ श्रीमती सुनीता माहेश्वरी की गाई सरस्वती वंदना और स्वागत गीत एवं नागरी अध्येता डॉ रश्मि चौबे द्वारा प्रस्तुत नागरी वंदना से हुआ। डॉ कोटमे ने संगोष्ठी की प्रस्तावना प्रस्तुत की।
नागरी लिपि परिषद के महामंत्री एवं न्यूयॉर्क, अमेरिका से प्रकाशित वैश्विक हिंदी पत्रिका सौरभ के संपादक डॉ हरिसिंह पाल ने विषय प्रवर्तन प्रस्तुत करते हुए नागरी लिपि परिषद की स्थापना और इसके उद्देश्यों और लक्ष्यों पर प्रकाश डाला। आपने बताया कि आचार्य विनोबा भावे ने नागरी लिपि में वैश्विक लिपि बनने की सामर्थ्य को रेखांकित करते हुए इसे विश्व लिपि के रूप में अग्रसारित करने का आवाहन किया था। उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए परिषद ने जापानी, भाषा इंडोनेशिया, सिंहली, इतालवी, रूसी, चीनी, अरबी फारसी सहित अनेक भारतीय भाषाओं की प्रवेशिकाएं तैयार कर प्रकाशित की थीं, ताकि नागरी लिपि के माध्यम से इन भाषाओं को समझा और बोला जा सके। लालबहादुर शास्त्री शिक्षा महाविद्यालय, बेंगलुरु के पूर्व प्राचार्य डॉ इसपाक अली ने नागरी लिपि के इतिहास पर शोधपरक प्रकाश डालते हुए इसके वैश्विक सामर्थ्य को रेखांकित किया।
नीदरलैंड से प्रकाशित साहित्य का विश्व रंग पत्रिका के संपादक और साझा संसार के अध्यक्ष डॉ रामा तक्षक ने नागरी लिपि के दार्शनिक पक्ष को व्याख्यायित किया।माॅरिशस के बहुभाषी लेखक और हिंदी अध्यापक डॉ सोमदत्त काशीनाथ ने विश्व लिपि के रूप में नागरी लिपि के सामर्थ्य को माॅरिशस के संदर्भ में प्रस्तुत किया। जलेश्वर – जनकपुर धाम , नेपाल के प्राचार्य डॉ अजय कुमार झा ने नेपाल में नागरी लिपि के प्राधान्य स्पष्ट किया। राष्ट्र किंकर के संपादक श्री विनोद बब्बर ने दैनिक व्यवहार में नागरी लिपि के अधिकाधिक प्रयोग पर बल दिया। अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात भाषा शास्त्री डॉ वी आर जगन्नाथन ने अपने शोध परक व्याख्यान में नागरी लिपि की वैज्ञानिकता को भाषा विज्ञान की कसौटी पर खरा बताया और इसमें विश्व लिपि बनने की सामर्थ्य को रेखांकित किया।चेन्नई,तमिलनाडु की डॉ राजलक्ष्मी कृष्णन, और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व प्रचारक श्री एस अनंत कृष्णन, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर डॉ हरनेक सिंह गिल, माॅरीशस और ट्रिनिडाड और टुबैगो में रही पूर्व राजनयिक (हिंदी) श्रीमती सुनीता पाहुजा ने भी विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।
ओस्लो, नार्वे के नागरी हिंदी सेवी श्री सुरेश चन्द्र शुक्ल की विशेष उपस्थिति में विशाखापत्तनम की डॉ विजया भारती जेल्दी और जैबुन्निशा, डिब्रूगढ़, असम के वरिष्ठ पत्रकार श्री ललित भूषण, मुंबई के डॉ मृगेंद्र राय,चेन्नई की डॉ के पद्मिनी, कर्नाटक के डॉ नागनाथ भेंड़े, डॉ मुजावर जैनु हामिद, चेन्नई के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ सी मणिकंठन, भुवनेश्वर, ओडिशा के श्री हरिराम पंसारी, भागलपुर, बिहार की डॉ पुष्पा कुमारी,, बतिया की डॉ शिप्रा मिश्रा,दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो शैलजा , सोनाली, डॉ रामायण पाल,छत्तीसगढ़ के रतिराम गढ़ेवाल, हरिश्चन्द्र पाल, सुबिया फैजल, डॉ अवन्तिका शर्मा, नवसारी, गुजरात की डॉ शोभना जैन, पुणे के डॉ अनिल काले,जयवीर सिंह, रोहित रत्न खैरनार सोनभद्र के डॉ ओमप्रकाश त्रिपाठी, चित्रकूट के डॉ रजनीश कुमार पाल, बिजनौर की डॉ रीना प्रताप सिंह, जौनपुर के वरिष्ठ पत्रकार डॉ ब्रजेश कुमार यदुवंशी, नाशिक की डॉ पूर्णिमा झेंडे, स्वाति पाल,जुअली कुलकर्णी, सविता मुढे,बी एच गाढीलोहार, अनीता कोष्टी, वैशाली डामले, कल्पना शैजवाल, डॉ संतोष पगार, जसप्रीत कौर,प्रो दीपमाला, हरदीप कौर, डॉ प्रकाश चिक्रूदकर सहित 100 से अधिक नागरी प्रेमियों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। महाविद्यालय के हिंदी प्राध्यापक डॉ जगदीश परदेशी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
