
नई दिल्ली। देश के सबसे प्रख्यात वन्यजीव संरक्षणवादियों और लेखकों में से एक वाल्मीक थापर का शनिवार सुबह उनके आवास पर निधन हो गया। वह 73 वर्ष के थे।
नई दिल्ली में 1952 में जन्मे थापर ने अपना जीवन खासकर राजस्थान के रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान में बाघों के अध्ययन और संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने 1988 में ‘रणथंभौर फाउंडेशन’ की सह-स्थापना की जो समुदाय-आधारित संरक्षण प्रयासों पर केंद्रित एक गैर-सरकारी संगठन है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने उनके निधन को एक बड़ी क्षति बताया। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा, ‘‘आज का रणथंभौर खास तौर पर उनकी गहरी प्रतिबद्धता और जुनून का प्रमाण है। जैव विविधता से जुड़े कई मुद्दों पर उन्हें असाधारण जानकारी थी और मंत्री के रूप में मेरे कार्यकाल के दौरान एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब हम एक-दूसरे से बात न करते हों…।’’
थापर को 2005 में सरिस्का बाघ अभयारण्य से बाघों के गायब होने के बाद बाघ अभयारण्य के प्रबंधन की समीक्षा करने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की पूर्व सरकार द्वारा गठित बाघ कार्य बल का सदस्य नियुक्त किया गया था।
थापर ने वन्यजीवों पर 30 से अधिक पुस्तकें लिखीं या संपादित कीं जिनमें ‘लैंड ऑफ द टाइगर: ए नेचुरल हिस्ट्री ऑफ द इंडियन सबकॉन्टिनेंट‘ (1997) और ‘टाइगर फायर: 500 इयर्स ऑफ द टाइगर इन इंडिया’ शामिल हैं। उन्होंने बीबीसी जैसे कई चैनल के लिए कई प्रसिद्ध फिल्म भी प्रस्तुत कीं और उनका सह-निर्माण किया।
जीवविज्ञानी संरक्षक नेहा सिन्हा ने वाल्मीक को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वह ‘‘कई वर्षों तक भारतीय बाघों की अंतरराष्ट्रीय आवाज’’ रहे। उन्होंने लोगों से श्रद्धांजलि के रूप में वाल्मीक की ‘टाइगर फायर’ और ‘लिविंग विद टाइगर्स’ जैसी प्रभावशाली पुस्तकें पढ़ने का आग्रह किया।
वन्यजीव संरक्षणवादी निर्मल घोष ने उन्हें ‘‘बाघ संरक्षण के प्रयासों में ऐसी अग्रणी हस्ती’’ कहा जिसने ‘‘बाघों के वैश्विक पैरोकार के रूप में एक स्थायी विरासत’’ छोड़ी है।
