
डॉ. सत्यवान सौरभ
रसोई की धीमी आंच में
एक जीवन उबलता रहा,
मधुरता और संकल्प की खुशबू में,
संतोष मुस्कुराती रही।
घर की दीवारें थीं सीमाएँ,
पर उनके हृदय की खिड़कियाँ खुली,
सत्य और समाज की ठंडी हवा से भरी।
शब्द उनके हाथ में पत्थर,
पर फूलों का कोमल स्पर्श भी वहीं खिलता।
सांझ की सुनहरी छाया में
वे बैठतीं, सोचतीं, लिखतीं—
हर शब्द में समाज की धड़कन,
हर पन्ने में जीवन की हलचल।
वशिष्ठ सदन, विचारों का उद्यान,
जहाँ हर मन पाता शांति,
हर विचार पाता दिशा।
और वह—माँ, दीपक, मार्गदर्शक,
सबके लिए स्थिर प्रकाश की तरह।
पत्रकारिता उनके लिए केवल पेशा नहीं थी,
यह सेवा थी, यह सत्य की शपथ थी।
सत्य, नैतिकता, सेवा लिए—
हर पन्ने में गूँजती उनकी साँस।
सरलता उनका सबसे बड़ा अस्त्र थी,
मुस्कान में समेटा हर संघर्ष।
कहती थीं—
“रिश्तों की शिक्षा घर की मिट्टी में है।
समाज को समझाने से पहले,
अपने खून के रिश्ते सँभालो।”
आज उनका शरीर हमारे बीच नहीं,
पर स्मृति की हर परछाई में वे जीवित हैं।
सत्य, साहस, सरलता और सेवा—
इन धरोहरों की छाया में,
हर आयरन लेडी मुस्कराती है,
संघर्ष झेलकर भी रोशनी देती है।
