
पारमिता षड़ंगी
मुम्बई
कविता का काम क्या है?
सिर्फ़ शब्दों की देखभाल में
अपनी सारी दक्षता खर्च कर देने के अलावा ?
फूल के विश्वास को थामने में,
इंद्रधनुष को रंग उधार देने में,
सड़क पर मिट्टी ढोते
एक बूढ़े की फटी चप्पल को
सी न पाने की बेबसी में?
पिताजी कहते थे
“हर नदी अपने चाँद को लेकर बहती है।”
तो फिर आसमान में
चाँद किसके सहारे टिका है ?
नदी और उसके किनारे के साहारे
नाविक और उसकी बेटी के साहारे
पक्षी और उसकी कहानी के साहारे
या कविता और उसकी समीक्षा के साहेरे ?
कविता जानती है
किसे भूख है,
किसका सपना मर रहा है,
लेकिन वह तो केवल
रक्त के रंग को उपमा देने में लगी है ।
इसलिए कभी-कभी
कविता लिखना
एक तरह का
अपराध सा लगता है।
