
डा. नीरज भारद्वाज
अधूरी नहीं हूँ कहानी संग्रह डा. अंजु वेद का पहला कहानी संग्रह है। यह कहानी संग्रह कई मायनों में अलग है। संग्रह को पढ़ते हुए न जाने कितने ही साहित्यकार और रचनाएँ मन मस्तिष्क को छू गए। इतना ही नहीं कहानी संग्रह ने समाज को नई रोशनी और नए विचार देने का बहुत बड़ा कार्य किया है। यह सृष्टि नर और नारी के योग से ही आगे बढ़ी है, लेखिका ने तो अपने नाम में ही मान लिया है कि वह अधूरी नहीं है, क्योंकि उसके साथ उसका सहचर और प्रिय है।
संग्रह के समर्पण में लेखिका लिखती हैं कि- कहानी पढ़ने- सुनने वाले उन सभी को जो कहानी को केवल कल्पना अथवा मनोरंजन नहीं मानते अपितु जीवन की अभिव्यक्ति मानते हैं। इस बात से स्पष्ट है कि कहानी कहीं और नहीं है वह हमारे और आपके आसपास ही विचरण करती रहती है। बस उसे देखने,समझने व लिखने का हौसला आपके पास होना चाहिए।
कहानी संग्रह में पारिवारिक संघर्ष को लेखिका ने खूब जमकर लिखा है। हर एक कहानी में पारिवारिक संघर्ष और वह भी लड़की अर्थात् नारी को ही करना पड़ता है, इसे दिखाने का पूरा प्रयास किया है।
कितने ही मिथकों को तोड़ता यह कहानी संग्रह बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ को स्पष्ट करता नजर आता है। हर एक कहानी में प्रमुख पात्र नारी ही है। वह संघर्ष से खड़ी होती है, पढ़ती लिखती है, घर का झाड़ू चौका करती है, बच्चे पालती है, कामकाज करती आधुनिक समाज में अपनी एक अलग ही छाप छोड़ती नजर आती है।
कुनिया कहानी में कुनिया विद्यालय जाती है, पढ़ने में धीरे-धीरे रुचि बनती है। लेकिन जल्द ही काल का ग्रास बन जाती है। अध्यापिका कुनिया के घर तक पहुँचती है परंतु तब तक कुनिया इस दुनिया से जा चुकी होती है। कहानी में अध्यापिका को अर्थात् नारी को शिक्षित व समाज हितेषी और ममता का प्रतीक दिखाया गया है।
अधूरी नहीं हूँ नामक कहानी में यशवंती को पढ़ा-लिखा दिखाया गया है। कहानी के आरंभ में ही कहानीकार लिखती हैं कि- यशवंती तीनों भाइयों से अधिक पढ़ी थी। राघवदास बेटी की समझदारी पर अक्सर बेटों को डाँटा करता- कुछ सीखो इससे….उसी घर में तुम रहते हो और उसी में यह….ये घर को सँवारती है और तुम…। यशवंती पुनीत के साथ प्रणय सूत्र में बंध जाती है। लेकिन पुनीत पिता नहीं बन सकता। यशवंती यहाँ हार नहीं मानती है, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर वह पति के साथ रहना चाहती है। लेकिन पति को यह सभी कुछ ठीक नहीं लगता। यशवंती हिम्मत से काम लेती है। यशवंती ने माँ-बाबूजी की बागवानी को अपना उद्यम बनाया। मसाले उगाए और उनका व्यापार आरंभ किया। नए काम में, आत्मनिर्भरता की धुन में जब कभी वह निराश होती तो बाबूजी की सिखाई बातें उसका मार्गदर्शन करतीं। इतना ही नहीं यशवंती एक बच्ची को गोद लेकर समाज के सामने एक नया उदाहरण भी रखती है। माँ-बाप बनना या न बनना नियति के हाथ है। बदलती सोच ने जहाँ चाह, वहाँ राह को दिखाया है।
कल्पना कहानी में नारी के त्याग, समर्पण, प्रेम को दिखाया है। साथ ही पढ़ी-लिखी लड़की कल्पना ने किस प्रकार अपने परिवार को संभाला, इस बात को बड़े ही सुंदर तरीके से दिखाया है।
क्या अपराध था नामक कहानी रेवती की मृत्यु के साथ शुरू होती है। रेवती के पति को सजा मिलती है। साक्षरता ने लोगों को न्याय व्यवस्था के विषय में बताया है। कहानी दहेज प्रथा को दिखाती नज़र आती है। किसी गरीब की बेटी को उसके पिता से अलग कर दिया गया। उस पिता से जिसने बेटी के सुख के लिए अपनी जमीन बेचकर उसका विवाह अच्छे परिवार में किया। कहानीकार ने यहाँ सामाजिक व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, पढ़ी-लिखी और अनपढ़ दोनों ही प्रकार की नारी त्रासदी को बड़े ही सुंदर ढंग से उजागर किया है।
संग्रह की बिंदी वाली, लुभावन व मैं मॉडर्न हूँ आदि कहानियां भी भिन्न-भिन्न रूपों में समाज में बेटी, मां, बहन व पत्नी यानी एक स्त्री की विभिन्न भूमिकाओं और उसकी स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण करती हैं। तेरी पहचान नामक कहानी थर्ड जेंडर को लेकर लिखी गई है। एक तरफ इस विषय पर लोग बात तक नहीं करना चाहते। लेकिन लेखिका ने बड़े ही मनोयोग से इस कहानी के घटनाक्रम को लिखा है। सुंदरी कहानी की नायिका है और वह पढ़ लिखकर ऊँचे पद पर नौकरी प्राप्त करती है तथा समाज के लिए एक आदर्श खड़ा करती है। लेखिका समाज को व पाठक को नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर करती हैं। अनोखी नामक कहानी नारी के साहस, लगन व प्रतिष्ठा की सच्ची कहानी लगती है। इसी प्रकार शिक्षा की परख नामक कहानी दो सहेलियों की कहानी है। पूर्वी और सुलेखा दोनों ही छोटे से गाँव से निकली और पढ़-लिखकर बड़ा व्यक्तित्व बना लिया। आज गाँव में बेटियों के लिए बड़े विद्यालय का उद्घाटन है, जिसका फीता कोई वी.आई.पी. नहीं, इसी गाँव की बेटियाँ काटेंगी। पूर्वी और सुलेखा को विशेष आमंत्रण दिया गया है। क्योंकि इन दोनों के परिश्रम, लगन और साहस ने इस गाँव को एक नई पहचान दिलाई। कहानी गाँव की संस्कृति और शहरी जीवन दोनों को दिखाती है।
पूरे कहानी संग्रह में नारी शिक्षा, संस्कृति और समाज को बारीकी से उद्घाटित किया गया है। इसमें जो सबसे ताकतवर और समाज हितेषी संदेश है वह यह है कि हर एक कहानी में बेटी पढ़ती हैं। वे पढ़ी-लिखी होने के साथ-साथ समाज को नए नए आयाम और दृष्टिकोण देती नजर आती है। इस दृष्टि से देखें तो बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ की बात को कहानीकार ने बड़े ही सुंदर ढंग से विश्लेषित किया है। ये केवल कहानियाँ मात्र नहीं है, बल्कि यथार्थ को दिखाती-समझाती मानवीय सोच का वह दस्तावेज हैं, जिसे डा. अंजु वेद ने खुलकर लिखा है। कहानियों को पढ़ते समय लगता है कि सभी घटनाएँ हमारे समाज में हर रोज कहीं न कहीं घटित हो रही हैं। कहानीकार ने समाज को संदेश भी दे दिया है कि- बेटियों को बचाना तो है ही, साथ ही साथ उन्हें पढ़ाना भी जरूरी है। इससे हर घर मजबूत बनेगा और जब घर मजबूत बनेगा तो राष्ट्र भी मजबूत बनेगा।
