
राजेश कुमार पासी
जब 2014 में नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो वो सिर्फ एक सत्ता परिवर्तन था । दस साल तक लगातार कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए गठबंधन शासन कर रहा था जिस पर लाखों करोड़ों के भ्रष्टाचार का आरोप लगा हुआ था । देश की जनता यूपीए से छुटकारा चाहती थी, इसलिए भाजपा को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मौका दिया । यह कोई सामान्य बात नहीं थी क्योंकि 1984 के बाद किसी भी पार्टी को देश की जनता ने बहुमत नहीं दिया था । 1984 के बाद बनी सभी सरकारें अल्पमत की सरकारें थी । नरेंद्र मोदी के नए चेहरे में जनता को नई उम्मीदें नजर आई, इसलिए यह मौका उनको दिया गया ।
पिछले 11 सालों में मोदी सरकार के शासन ने बता दिया है कि 2014 में सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ था बल्कि देश में व्यवस्था परिवर्तन हुआ था । पूरे देश में आतंकवाद फैला हुआ था, आतंकवादी कभी भी किसी भी शहर में बम फोड़ सकते थे, गोलियां चला सकते थे । देश का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा नक्सलवाद से ग्रस्त था और उसका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा था । आज मोदी सरकार ने आतंकवाद को सिर्फ कश्मीर तक सीमित कर दिया है और नक्सलवाद को 31 मार्च, 2026 तक पूरी तरह से मिटाने का लक्ष्य तय कर दिया है । अब सवाल उठता है कि क्या कारण थे, जिनकी वजह से देश में आतंकवाद और नक्सलवाद बढ़ता जा रहा था । सरकार की कोशिशें बेकार जा रही थी । धीरे-धीरे देश को समझ आ रहा है कि देश में एक ऐसा इको सिस्टम था जो आतंकवाद और नक्सलवाद को पालने-पोसने का काम कर रहा था । सरकार ने इनके सामने हथियार डाल दिया था और सरकार इनके साथ समझौता करके काम कर रही थी । 1990 से आतंकवाद का बड़ा चेहरा रहे यासीन मलिक ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक हलफनामा देकर कहा है कि 2006 में तत्कालीन सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उसे पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा के मुखिया हाफिज सईद से मुलाकात करने के लिए कहा था । जब वो हाफिज सईद से मिलकर मनमोहन सिंह जी के पास गया तो उन्होंने उसका धन्यवाद किया और आभार जताया था ।
यासीन मलिक वो आतंकवादी है जिसने श्रीनगर में चार वायुसेना अधिकारियों की गोली मारकर हत्या कर दी थी । कश्मीरी पंडितों के कश्मीर छोड़ने में यासीन मलिक का डर भी एक बड़ा कारण था । उस पर तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद के अपहरण का भी आरोप है । लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता के रूप में वो कश्मीर में आतंकवाद का एक बड़ा चेहरा बना रहा और पाकिस्तान के आतंकियों से उसके गहरे संबंध थे । वो अब टेरर फंडिंग मामले में जेल में बंद है । उसे जेल में डालने का काम भी मोदी सरकार ने ही किया है । उसने दावा किया है कि 2005 में पाकिस्तान में आए बड़े भूकंप के बाद जब वो पाकिस्तान जाने की तैयारी कर रहा था तो खुफिया ब्यूरो(आईबी) के तत्कालीन विशेष निदेशक वीके जोशी ने दिल्ली में उससे मुलाकात की थी । उसका कहना है कि जोशी ने उसे कहा था कि यह मौका सिर्फ पाकिस्तानी नेताओं से बात करने का नहीं है, बल्कि हाफिज सईद जैसे आतंकी सरगनाओं से भी बातचीत करने का है । उसका उद्देश्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की शांति पहल को आगे बढ़ाने का था । उसका कहना है कि उसे साफ तौर पर समझाया गया कि पाकिस्तान के साथ बातचीत तभी असरदार हो सकती है जब आतंकवादी संगठनों के नेताओं को भी इसमें शामिल किया जाए । उसने दावा किया है कि सरकार के इसी निर्देश के कारण उसने पाकिस्तान में आयोजित एक कार्यक्रम में हाफिज सईद और यूनाइटेड जिहाद काउंसिल के अन्य नेताओं से मिलने की बात मानी थी ।
अपने हलफनामे में मलिक ने बताया है कि कैसे सईद ने जिहादी समूहों का एक सम्मेलन आयोजित किया जहां सईद ने भाषण दिया और आतंकवादियों से शांति अपनाने का आग्रह किया । उसका कहना है कि उसकी यही मुलाकात बाद में विवाद का विषय बन गई क्योंकि इसे उसकी पाकिस्तानी आतंकवादी संगठनों से निकटता के सबूत के रूप में पेश किया गया है । अपने हलफनामे में उसने इस घटनाक्रम को ‘एकदम विश्वासघात’ बताया है । उसने दावा किया है कि आईबी से बातचीत के बाद उसे सीधे प्रधानमंत्री को जानकारी देने के लिए कहा गया था । वो राजधानी में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला था । उसका दावा है कि उस मुलाकात में मनमोहन सिंह ने व्यक्तिगत रूप से उसे पाकिस्तान के सबसे कट्टरपंथी तत्वों से निपटने में उसके द्वारा किए गये प्रयास, धैर्य और समर्पण के लिए धन्यवाद दिया था ।
उसने जो दावा किया है, उसकी गवाह वो तस्वीर भी है जो सोशल मीडिया में घूमती रहती है जिसमें वो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुलाकात करता हुआ दिखाई दिया था । उसका दावा है कि 1990 में उसकी गिरफ्तारी के बाद वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर, नरसिम्हा राव, एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लगातार 6 सरकारों ने उससे सक्रिय रूप से संपर्क किया । अब सवाल उठता है कि अगर उसका दावा सही है तो भारत की शांति वार्ताओं में उसके जैसे आतंकवादी को साथ क्यों लिया गया । कई बार गुप्तचर एजेंसियां ऐसे लोगों का इस्तेमाल करती हैं लेकिन प्रधानमंत्री के स्तर पर ऐसे लोगों का इस्तेमाल कभी नहीं किया जाता । उसका यह दावा बेहद खतरनाक है कि दुनिया के सबसे वांछित आतंकवादियों में शामिल में से एक के साथ बैठक करने के लिए प्रधानमंत्री ने उसका आभार प्रकट किया । क्या तत्कालीन सरकार आतंकवादियों के सामने हथियार डाल चुकी थी । शांति का प्रयास अच्छी बात है लेकिन इस प्रयास का नतीजा हमें दो साल बाद 26/11 के मुंबई हमले के रूप में देखने को मिला था ।
सवाल तो यह भी उठता है कि क्या सरकार की इन्हीं कमजोरियों के कारण आतंकवादियों और उनके आका पाकिस्तान के हौसले इतने बुलंद थे कि वो भारत में जहां चाहे हमला कर सकते थे । क्या सरकार मान चुकी थी कि वो आतंकवादियों से नहीं निपट सकती, इसलिए उनसे शांति का रास्ता अपनाने का अनुरोध किया जा रहा था । कांग्रेस को जवाब देना चाहिए कि वो आतंकवादियों को शांति के रास्ते पर लाने के लिए क्या देने वाली थी । आतंकवादियों का उद्देश्य तो कश्मीर को भारत से अलग करना था, तो क्या सरकार इस पर विचार कर रही थी । सवाल यह है कि जब केन्द्र सरकार ही आतंकवादियों से बातचीत कर रही थी तो आतंकवाद से कौन लड़ रहा था । यासीन मलिक के दावे से यह लगता है कि आतंकवादियों के खिलाफ सरकार कार्यवाही करने के मूड में नहीं थी । मोदी सरकार के आने के बाद ही आतंकवादियों के खिलाफ प्रभावी कार्यवाही शुरू हुई है । मोदी ने खुद तो बंदूक उठाकर आतंकवादियों का देश से सफाया नहीं किया है । देश को आतंकवादियों से छुटकारा हमारे देश की खुफिया एजेंसियों और सैन्य बलों ने ही दिलाया है । कश्मीर में भी हमारी सुरक्षा एजेंसियां आतंकवादियों का मुकाबला कर रही हैं । जो काम मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान हुआ है, वो काम पिछली सरकारों के दौरान क्यों नहीं हो पाया । हमारी खुफिया एजेंसियां वही हैं और हमारी सुरक्षा एजेंसियां भी वही हैं, सिर्फ सरकार बदली है । इसका मतलब साफ है कि पहले सरकार की नीयत आतंकवादियों को खत्म करने की नहीं थी ।
आज भी कश्मीर में सरकार आतंकवाद से लड़ रही है और उसके आका पाकिस्तान से भी लड़ रही है । पहले सर्जिकल स्ट्राइक, फिर एयर स्ट्राइक और अब ऑपरेशन सिंदूर करके पाकिस्तान को भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए सजा दी गई है । पहलगाम हमले के बाद देश का विपक्ष मोदी सरकार पर सवाल खड़े कर रहा था कि आतंकवादी हमला कैसे हो गया जबकि एक समय उसी के शासन में पूरे देश में आतंकवादी हमले होते थे । पुलवामा हमले पर सवाल किया जाता है कि आरडीएक्स कैसे आया था जबकि पहले पूरे भारत में आरडीएक्स से हमले होते थे । राहुल गांधी के गुरु सैम पित्रोदा ने कहा है कि उन्हें पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल घर जैसे लगते हैं और सरकार को सलाह दी है कि भारत को पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध रखने चाहिए । वास्तव में उन्होंने कांग्रेस की विचारधारा को देश के सामने रखा है । जो पाकिस्तान अभी भी भारत पर आतंकवादी हमले करने की साजिशें कर रहा है और देश में उसके खिलाफ गुस्सा भरा हुआ है, उसे वो अपना घर बता रहे हैं । ऑपरेशन सिंदूर में तबाह हुए आतंकवादी ठिकानों को वो दोबारा तैयार कर रहा है और नए आतंकियों की भर्ती की जा रही है । ऐसा लग रहा है कि भारत सरकार जल्दी ही उसके खिलाफ बड़ी कार्यवाही कर सकती है ।
जहां मोदी सरकार देश में शांति लाने का प्रयास कर रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता राहुल गांधी देश को नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी अराजकता में ले जाने के लिए युवाओं को भड़का रहे हैं । चुनाव आयोग मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण कर रहा है जिसके कारण बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर किये जाने का खतरा पैदा हो गया है । राहुल गांधी घुसपैठियों को बचाने के लिए चुनाव आयोग के खिलाफ बड़ी मुहिम चला रहे हैं । यह सब वो मतदाता सूचियों में गड़बड़ी की आड़ में कर रहे हैं जबकि चुनाव आयोग मतदाता सूची की गड़बड़ी को ठीक करने के लिए ही गहन पुनरीक्षण कर रहा है । यासीन मलिक के दावे बता रहे हैं कि देशविरोधी इको सिस्टम मोदी सरकार के आने से डरा हुआ है, इसलिए मोदी सरकार के खिलाफ साजिशों का दौर चल रहा है । देश में ऐसा क्या हो रहा है, ये जनता को समझने की जरूरत है ।
