
डॉ. नीरज भारद्वाज
शिक्षा समाज में मार्गदर्शक का काम करती है। शिक्षा को लेकर समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। जैसे-जैसे तकनीक बदल रही है, वैसे ही शिक्षा का तकनीक के साथ जुड़ना और उसमें परिवर्तन होना स्वाभाविक है। विचार करें तो जो भी आक्रमणकारी भारत आया, उसने इस पवित्र भूमि पर अपना स्वामित्व स्थापित करने का प्रयास भी किया। किसी काल खंड़ में अपना स्वामित्व स्थापित करने में वह सफल भी हुए। सभी आक्रमणकारियों ने हमारे सामाजिक ढांचे को ध्वस्त किया, मार-काट के अलावा इन्होंने समाज को कुछ नहीं दिया। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था को खंडित कर दिया। हमारी गुरुकुल परंपरा, हमारी ज्ञान परंपरा, हमारे वेद आदि पढ़ने की परंपरा सभी को तरोड़-मरोड़ दिया। ज्ञान के भंडार देवतुल्य आचार्यों को मारा, उन्हें कठोर कारावास में डालकर यातनाएं दीं या फिर उनके गुरुकुल-आश्रम आदि को खंडित कर दिया। जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक शोपनहॉर ने लिखा है कि विश्व के सम्पूर्ण साहित्यिक भंडार में किसी ग्रन्थ का अध्ययन मानव के विकास के लिए इतना हितकर तथा ऊँचा उठानेवाला नहीं है, जितना उपनिषदों का अध्ययन। हमारी ज्ञान परंपरा, हमारी शिक्षा व्यवस्था को मिटाने का प्रयास सभी आक्रमणकारी करते रहे। हमारे नालंदा पुस्तकालय को जला दिया, हमारे ग्रंथो को उठाकर अपने देश ले गए, वहां अपनी भाषा में अनुवाद करके अपने नाम से छपवा लिया।
हम अपनी ही ज्ञान परंपरा और शिक्षा व्यवस्था को भूलकर अपने बच्चों को उन विदेशी लोगों के नाम रटवा रहे हैं, जिनमें से अधिकतर हमारे ज्ञान के बल पर कार्य कर अपनी भाषा में छपवा रहे हैं। बड़े-बड़े मंचों पर तथाकथित बुद्धिजीवी उनका नाम लेकर उन्हें स्थापित करने में लगे रहते हैं। हमारी शिक्षा और ज्ञान परंपरा में वेद, शास्त्र, पुराण, उपनिषद आदिकी बातें कम होती है बल्कि विदेशी लोगों के ज्ञान की चर्चा अधिक होती है। कमाल कि बात यह है कि विदेशी हमारे देश में ज्ञान की खोज में आते हैं शोध करते हैं, हमारे संत-महात्माओं आदि के पास बैठकर ज्ञान लेते हैं। मैक्स मूलर ‘India: What Can it Teach Us’ पुस्तक में लिखते हैं कि अगर मैं विश्व भर में से उस देश को ढूँढने के लिए चारों दिशाओं में आँखें उठाकर देखुँ जिस पर प्रकृति-देवी ने अपना सम्पूर्ण वैभव, पराक्रम तथा सौन्दर्य खुले हाथों लुटाकर उसे पृथ्वी का स्वर्ग बना दिया है, तो मेरी अंगुली भारत की तरफ़ उठेगी। अपने ही देश में ज्ञान के स्रोत वेद, शास्त्र, रामायण, गीता आदि को तथाकथित बुद्धिजीवियों ने धार्मिक ग्रंथ कहकर शिक्षा संस्थानों में पढ़ने-पढ़ाने ही नहीं दिया। संस्कृत विद्यालयों और विश्वविद्यालय में ही यह शिक्षा सिमट कर रह गई। जबकि हम सभी को गीता के श्लोक, वेद-उपनिषद के मंत्र, श्लोक, ऋचाएं, पंक्तियां आदि जरूर याद होने चाहिए। डॉ. एफ. डब्ल्यू. थामस ने अपनी पुस्तक The History and Prospects of British Education in India में लिखा है कि भारत में शिक्षा कोई नई बात नहीं है। संसार का कोई भी देश ऐसा नहीं है जहां ज्ञान के प्रति प्रेम इतने प्राचीन काल से आरम्भ हुआ हो अथवा जिसने इतना स्थायी और शक्तिशाली प्रभाव उत्पन्न किया हो। विचार करें तो भारतवर्ष विश्व को ज्ञान-विज्ञान देने वालों में प्रथम देश है लेकिन हम अपने ही देश में, अपनी ही परंपराओं से अनभिज्ञ नजर आते हैं।
स्वतंत्रता के बाद पूरी शिक्षा व्यवस्था में ऐसा लगता है मानों एक योजना सी चलाई गई कि हम अपने ही देश में अपनी भाषाओं और ज्ञान परंपरा से दूर हो जाएं। देखा-समझा जाए तो हुआ भी कुछ ऐसा ही है। विकास के नाम पर अंग्रेजी को पढ़ाया जाने लगा। विचार करें तो किसी भी देश का व्यक्ति अपनी भाषा में ही सोचता समझता है। लेकिन विदेशीपन का प्रभाव हमारे ऊपर बहुत बना हुआ है। लोग धीरे-धीरे अपनी भाषाओं से पिछड़ने लगे। देव भाषा संस्कृत को तथाकथित बुद्धिजीवियों ने पूजा पाठ की भाषा कहकर उसे शिक्षा क्षेत्र से हटा दिया।जबकि संस्कृत दुनिया की सबसे सरल, सरस और सुमधुर भाषा है। इसमें एकल और समूह में जब उच्चारण होता है तो देवता भी मंत्रमुग्ध होकर इनमें बंध जाते हैं। श्लोक उच्चारण से हमारे मन-मस्तिष्क की इंद्रियों को परम शांति और सुख मिलता है। हम तनाव से दूर होकर, अपने को स्वस्थ पाते हैं। कितनी ही प्रकार की पूजा-पाठ, हवन, मंत्र उच्चारण से अस्वस्थ, तनावग्रस्त आदि लोगों को ठीक किया जाता है। इससे ज्यादा वैज्ञानिक प्रमाण किसी को ओर क्या चाहिए।
अंग्रेजी दासता से स्वतंत्रत होने के बाद देश में ही पैदा हुए काले अंग्रेजों ने देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था को विदेशी ढर्रे पर चलाया। लोग उसी के अनुसार चलते रहे, देश के यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी और शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जी के अथक प्रयासों से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा और शिक्षा व्यवस्था को नए आयाम दिए। हाल ही में छठे रामनाथ गोयनका व्याख्यान को संबोधित करते हुए मोदी जी ने कहा कि 1835 में ब्रिटिश सांसद मैकाले ने एलान किया था कि मैं एसे भारतीय बनाऊंगा, जो दिखने में तो भारतीय होंगे लेकिन मन से अंग्रेज होंगे। इसके लिए मैकाले ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था का समूल नाश कर दिया। विचार करें तो किसी हद तक हुआ भी कुछ ऐसा ही। मोदी जी ने देश को नई दिशा दी है। इसी व्याख्यान में मोदी जी कहा कि हमने नेशनल एजुकेशन पालिसी में स्थानीय भाषा में पढ़ाई पर जोर दिया है।विचार करें तोजब भाषा का विकास होगा तभी देश का विकास होगा।मोदी सरकार ने शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था में सुधार का नये-नये अध्याय लिखे हैं। हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने नई सोच और विचार को जन्म दिया है। अब हमारी शिक्षा व्यवस्था में वेद मंत्र और कंप्यूटर के माउस को एक साथ जोड़ दिया गया है। हमें अपनी ज्ञान परंपरा और शिक्षा व्यवस्था को सही से जानने और समझने की जरूरत है।
