सुप्रीम कोर्ट -‘राज्यपाल-राष्ट्रपति को बिल मंजूरी की समय-सीमा में नहीं बाँध सकता

asiakhabar.com | November 22, 2025 | 4:52 pm IST

रामस्वरूप रावतसरे
सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संवैधानिक पीठ (कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच) ने गुरुवार (20 नवंबर 2025) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपना ओपिनियन जारी किया। इस 111 पन्नों के फैसले में कोर्ट ने अपना ही अप्रैल 2025 का फैसला पूरी तरह पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न तो राज्यपाल और न ही राष्ट्रपति को विधानसभा से पारित बिलों पर फैसला लेने के लिए कोई निश्चित समय-सीमा तय की जा सकती है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘डीम्ड असेंट’ यानी समय बीतने पर बिल को अपने आप मंजूर मानने की अवधारणा को असंवैधानिक और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध भी घोषित किया। चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली बेंच में जस्टिस सूर्या कांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदूरकर शामिल थे। बेंच ने कहा कि संविधान ने अनुच्छेद 200 और 201 में जानबूझकर लचीलापन रखा है। इस लचीलेपन को सख्त समय-सीमा से बाँधना संवैधानिक पदों की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण होगा।
सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2025 के फैसले में 1 महीने से 3 महीने तक की डेडलाइन तय की गई थी। संवैधानिक पीठ ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि संविधान में कम से कम 31 जगहों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है (जैसे राष्ट्रपति चुनाव 30 दिन में, संसद सत्र 6 महीने में आदि)। जहाँ नहीं लिखी गई, वहाँ यह अनजाने में नहीं छोड़ा गया, बल्कि सोच-समझकर छोड़ा गया है। कोर्ट ने कहा कि अगर समय बीतने पर बिल अपने आप पास हो जाए तो इसका मतलब एक संवैधानिक पद (राज्यपाल/राष्ट्रपति) की जगह दूसरा संवैधानिक पद (न्यायपालिका) ले लेगा। यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।
राज्यपाल और राष्ट्रपति के फैसले न्यायिक समीक्षा से बाहर है। अनुच्छेद 200 और 201 के तहत लिया गया कोई भी फैसला (मंजूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति को भेजना) पूरी तरह गैर-न्यायिक है। इन्हें कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। अनुच्छेद 361 भी राष्ट्रपति और राज्यपाल को अपने आधिकारिक कृत्यों के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही से मुक्त करता है। बिल के कानून बनने से पहले अदालत दखल नहीं दे सकती। विधायी प्रक्रिया पूरी होने से पहले (यानी बिल के कानून बनने से पहले) अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कानून बनने के बाद ही उसकी संवैधानिकता पर सवाल उठाया जा सकता है।
यदि देरी ‘अनुचित, बेहिसाब और बिना किसी स्पष्टीकरण के’ हो जाए तो संवैधानिक अदालत सीमित दखल दे सकती है। अदालत केवल इतना निर्देश दे सकती है कि ‘उचित समय के अंदर फैसला लिया जाए’। वह यह नहीं बता सकती कि फैसला क्या होना चाहिए। राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प है मंजूरी देना, मंजूरी रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना। चौथा विकल्प यानी अनिश्चितकाल तक जेब में रखना संभव नहीं है। ऐसा करना संघीय ढाँचे की भावना के खिलाफ होगा।
राज्यपाल सुपर मुख्यमंत्री नहीं हो सकते, राज्य में दो कार्यपालिकाएँ नहीं चल सकतीं। चुनी हुई सरकार को ड्राइवर की सीट पर रहना है। राज्यपाल ज्यादातर मामलों में मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधे हैं लेकिन कुछ असाधारण मामलों में विवेकाधिकार का उपयोग कर सकते हैं। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को टकराव की जगह संवाद अपनाना चाहिए। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच बातचीत, मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलना-यही लोकतंत्र का सही रास्ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अप्रैल 2025 में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच द्वारा तय की गई 1-3 महीने की समय-सीमा और डीम्ड असेंट की व्यवस्था संविधान के मूल ढाँचे के विपरीत थी। उस फैसले में तमिलनाडु के 10 बिलों को बिना राज्यपाल-राष्ट्रपति की मंजूरी के ही कानून घोषित कर दिया गया था जिसे अब पूरी तरह अवैध ठहराया गया है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई 2025 में संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट को 14 संवैधानिक सवाल भेजे थे। ये सवाल सिर्फ समय-सीमा के नहीं थे, बल्कि पूरे संवैधानिक ढाँचे, शक्तियों के बँटवारे और न्यायपालिका की सीमा से जुड़े थे।
राष्ट्रपति ने यह रेफरेंस तमिलनाडु मामले में आए अप्रैल 2025 के फैसले के बाद भेजा था जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करने की कोशिश की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए संवैधानिक पीठ का गठन किया था। जिसमें जून से अक्टूबर 2025 तक दस दिन सुनवाई चली। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने पैरवी की। इसमें सरकार की तरफ से कुछ अहम दलीलें दी गई, जिसमें- संविधान में कम से कम 31 स्थानों पर समय-सीमा स्पष्ट लिखी गई है। जहाँ नहीं लिखी, वहाँ जानबूझकर लचीलापन छोड़ा गया है। राज्यपाल और राष्ट्रपति संवैधानिक पद हैं। एक संवैधानिक संस्था दूसरी को आदेश नहीं दे सकती। यदि राज्यपाल बिल रोक रहे हैं तो इसका समाधान राजनीतिक है- मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से मिलें, बात करें। हर समस्या का न्यायिक समाधान नहीं हो सकता।
साल 2023 से कई राज्यों में कथित तौर पर राज्यपालों और सरकारों के बीच टकराव बढ़ा। इसमें तमिलनाडु में राज्यपाल आरएन रवि ने 12 बिलों को महीनों तक रोके रखा। केरल, पंजाब, तेलंगाना में भी यही स्थिति रही। राज्य सरकारों का तर्क था कि राज्यपाल रबर स्टैंप नहीं बल्कि अड़ंगा बन रहे हैं। इस मामले में तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी। जिसमें 8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में फैसला देते हुए 3 अहम बातें कही थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने-राज्यपालों को 1-3 महीने की समय-सीमा में बाँध दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने डीम्ड असेंट की व्यवस्था बना दी थी।
इसके साथ ही तमिलनाडु असेंबली में पास हुए 10 बिलों को सीधे कानून घोषित कर दिया। इस फैसले से हंगामा मच गया। इसे न्यायिक अतिक्रमण करार दिया गया। इस संवैधानिक संकट की स्थिति में पारदर्शिता की और कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के लिए ही राष्ट्रपति ने 14 सवालों वाला रेफरेंस सुप्रीम कोर्ट के पास भेजा था।
सुप्रीम कोर्ट ने केसवनंद भारती (1973) के सिद्धांत को दोहराया कि शक्तियों का पृथक्करण संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। न्यायपालिका विधायी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। राज्यपाल संघ और राज्य के बीच सेतु हैं, न कि राज्य सरकार के अधीनस्थ। बाबासाहेब अंबेडकर ने कहा था कि भारत का संघीय ढाँचा ‘केंद्र की ओर झुका हुआ’ है ताकि देश की एकता बनी रहे।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला दशकों तक संवैधानिक व्याख्या का आधार बनेगा। कई कानूनी विशेषज्ञ इसे ‘संविधान की जीत’ और ‘लोकतंत्र की परिपक्वता’ का प्रमाण बता रहे हैं जिसमें राष्ट्रपति ने संवैधानिक तरीके से सवाल उठाया और सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले की गलती को सुधारते हुए सभी बिंदुओं की विस्तार से व्याख्या की।


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