
गोपाल बघेल ‘मधु’
टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा
कभी खुश थे किसी के आने से,
आज फुर्सत कहाँ उसे ज़माने से;
जिसको जाया था बड़ी हसरत से,
आज वो ज़ाया हुआ नज़रों से!
हुआ ओझल है दिल वो कहाँ रहा,
किसी भव विधा बिंधा दूर फिरा;
किसी नाटक है किसी निर्देशन,
बना नायक है तारकी तुरपन!
प्रयोग कर रहा है वह कोई,
प्रयोगित या किया जगत कोई;
प्रयोग या किए भुवन स्वामी,
प्रयोजन कुछ रहा भूमा भूमि!
जीव हर आया यहाँ विचरा किया,
योजना उनकी कार्य उनका किया;
कहाँ अपना था या किसी का था,
उन्हीं का था वो उन्हीं का रहा!
ज्ञात ना उसको क्या औ क्यों यों किया,
क्यों हुआ ऐसा दूर क्यों वो हुआ;
खोजे कस्तूरी रहा मृग ऐसे,
स्वयंभू ‘मधु’ हृदय रहे विहँसे!
