
नई दिल्ली। येल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित चैटबॉट डिजिटल सहायक उपकरण न केवल हमें जानकारी देते हैं, बल्कि बेहद चतुराई से हमारी सामाजिक और राजनीतिक सोच को भी बदल सकते हैं।
आज के दौर में जब हम सामान्य जानकारी के लिए भी निर्भर होते जा रहे हैं, तब यह चौंकाने वाला शोध सामने आया है।
अब तक माना जाता था कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तभी किसी को प्रभावित करती है, जब उसे जानबूझकर ऐसा करने का निर्देश दिया जाए। लेकिन इस नये अध्ययन ने साबित कर दिया है कि सामान्य ऐतिहासिक तथ्यों के सारांश भी पाठकों की सोच को मोड़ सकते हैं। यह सब उन अंतर्निहित कारणों की वजह से होता है, जो इन मॉडलों को प्रशिक्षित करने वाले डाटा से अनजाने में इनमें समा जाते हैं।
येल विध्वविद्यालय में समाजशास्त्र के सहायक प्रोफेसर डैनियल करेल के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने 1919 की सिएटल हड़ताल और 1968 के छात्र आंदोलनों जैसे विषयों पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से तैयार विवरणों का परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि विकिपीडिया जैसे पारदर्शी मंचों की तुलना में, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जवाबों ने पाठकों के दृष्टिकोण को एक विशेष वैचारिक दिशा की ओर झुका दिया।
यह अध्ययन पीएनएस नेक्सस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। येल कॉलेज के शोधार्थी मैथ्यू शू इसके प्रमुख लेखक हैं। प्रोफेसर करेल के अनुसार, “हालांकि एक बार के संवाद से पड़ने वाला प्रभाव मामूली है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपनी रोजमर्रा की जानकारी के लिए बार-बार इन चैटबॉट का उपयोग करता है, तो समय के साथ उसकी पूरी विचारधारा बदल सकती है।”
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जहां विकिपीडिया जैसे माध्यमों में संपादन और बदलाव की प्रक्रिया पारदर्शी होती है, वहीं इन चैटबॉट को बनाने वाली कंपनियों की कार्यप्रणाली पूरी तरह गुप्त है। इस शोध में चेतावनी दी गई है कि तकनीकी कंपनियों के पास अब लोगों की राय को बिना उनकी जानकारी के आकार देने की अभूतपूर्व शक्ति आ गई है, जो भविष्य के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकती है।
