प्रो. दिनेश चमोला “शैलेश” का मध्यप्रदेश में हुआ सम्मान’

asiakhabar.com | September 19, 2025 | 5:45 pm IST

नई दिल्ली। हिंदी के लब्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार, अनुवाद विशेषज्ञ एवं साहित्य अकादमी के बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित, प्रोफेसर (डॉ ) दिनेश चमोला ‘शैलेश’ को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के भोपाल स्थित प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थान, एम्प्री द्वारा सम्मानित किया गया । प्रो. चमोला का इसी सप्ताह राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित होने का यह द्वितीय अवसर है ।
देश के प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान द्वारा आयोजित हिंदी दिवस समारोह में में मुख्य अतिथि के रूप में व्याख्यान देने के लिए प्रो. चमोला को भोपाल आमंत्रित किया गया था । हिंदी माह के अवसर पर आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं, हिंदी में श्रेष्ठ विज्ञान लेखन लेखन करने वाले वैज्ञानिकों तथा वर्षभर अपना सर्वाधिक प्रशासनिक कार्य हिंदी में करने वाले साठ से अधिक प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा सांत्वना पुरस्कार प्राप्त करने वाले पुरस्कार विजेताओं को प्रमाणपत्र सहित पुरस्कृत करने के उपरांत प्रो. चमोला ने
‘ वैज्ञानिक संस्थानों में हिंदी : शब्दावली व अनुवाद के संदर्भ में’ विषय पर प्रासंगिक संस्कृत, हिंदी, पंजाबी व अंग्रेजी् काव्यभिव्यंजनाओं के साथ धाराप्रवाह भाषण दिया जिसे श्रोताओं न दत्तचित व भावविभोर होकर सुना ।
प्रो. चमोला ने अक्षर व शब्दब्रह्म से अपना वक्तव्य प्रारंभ करते हुए हुए कहा कि संसार की वे सारी भाषाएं-बोलियां सरस्वती-स्वरूपा हैं, वंदनीय हैं, स्मरणीय हैं, जिनमें ज्ञान की वर्षा होती है; जो सद् चिंतन-लेखन, अपने शुचितापूर्ण परिवेश से उत्प्रेरक का कार्य कर लोक के कल्याण का कार्य करता है । उन्होंने राजभाषा के औपबंधिक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए आज के युग में अनुवाद की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह सदी अनुवाद की सदी है । आज हमारे पास बौद्धिक-विश्व बाजार से जो ज्ञान, विज्ञान व सूचना प्राप्त हो रही है, वह अनुवाद के अनुवाद का अनुवाद है । इस प्रेक्षागृह में बैठे हुए प्रत्येक बुद्धिजीवी, चाहे वह वैज्ञानिक है अथवा प्रशासनिक या फिर कोई और…..हम सब जन्मजात अनुवादक हैं । बिना अनुवाद के इस दुर्लभ जीवन का एक क्षण भी व्यतीत नहीं किया जा सकता ।
प्रो. चमोला ने कहा विज्ञान व प्रौद्योगिकी की उत्कृष्टता को भी बिना भाषा के, जन सामान्य तक नहीं पहुंचाया जा सकता । भाषा, विशेषकर हिंदी व अन्य भाषाओं के बिना भारतीय जान परंपरा का व्यापक प्रसार किसी भी रूप।में संभव नहीं है । विज्ञान के चमत्कार, उत्कर्ष व उपलब्धियों को जन जन तक पहुंचाने में हिंदी के वृहत संसार की अपूर्व भूमिका हो सकती है । प्रभावी हिंदी विज्ञान लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए मानक एव पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग आवश्यक है । इस अवसर पर प्रो. चमोला ने संस्थान की वार्षिक पत्रिका ‘सोपान’ का लोकार्पण भी किया । स्वागत भाषण कार्यकारी निदेशक, प्रो. असोकन पप्पू ने कहा कि पिछले दो घंटे से धाराप्रवाह प्रो. चमोला के व्याख्यान ने हमें इतना मंत्रमुग्ध कर दिया कि हम सब कुछ।भूल गई। देवभूमि हिमालय से आकर इन्होंने जो ज्ञान की पवित्र गंगा बहाई, इसके लिए हम जीवन भर आभारी रहेंगे ।
सुंदर संचालन डॉ. मनीषा दुबे ने किया ।
विभिन्न विधाओं में सात दर्जन से अधिक पुस्तकों को लिखने वाले प्रो. चमोला, पिछले चवालीस (44) वर्षों से देश की अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए अनवरत लेखन करते रहे हैं तथा राष्ट्रीय स्तर पर साठ से अधिक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं । प्रो.चमोला हिंदी जगत में अपने बहु-आयामी लेखन व हिंदी सेवा के लिए सुविख्यात हैं तथा विभिन्न विषयों पर विशिष्ट व्याख्यानों के लिए देश विदेश।में आमंत्रित किए जाते हैं, यह अत्यंत गौरवपूर्ण है ।
ध्यातव्य है कि 14 जनवरी, 1964 को उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम कौशलपुर में स्वर्गीय पं. चिंतामणि चामोला ज्योतिषी एवं माहेश्वरी देवी के घर मेँ जन्मे प्रो. चमोला ने शिक्षा में प्राप्त कीर्तिमानों यथा एम.ए. अंग्रेजी, प्रभाकर; एम. ए. हिंदी (स्वर्ण पदक प्राप्त); पीएच-डी. तथा डी.लिट्. के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में भी
राष्ट्रव्यापी पहचान निर्मित की है। अभी तक प्रो. चमोला ने उपन्यास, कहानी, दोहा, कविता, एकांकी, बाल साहित्य, समीक्षा, शब्दकोश, अनुवाद, व्यंग्य, लघुकथा, साक्षात्कार, स्तंभ लेखन के साथ-साथ एवं साहित्य की विविध विधाओं में सतहत्तर (77) से अधिक पुस्तकों में लेखन किया है । आपके व्यापक मौलिक साहित्य देश के अनेक विश्वविद्यालयों में पीएच-डी.तथा एम.फिल. स्तरीय कई शोध कार्य संपन्न हो चुके हैं तथा अनेक विश्वविद्यालयों में वर्तमान में चल रहे हैं ।
आपकी चर्चित पुस्तकों में ‘यादों के खंडहर, ‘टुकडा-टुकड़ा संघर्ष, ‘प्रतिनिधि बाल कहानियां, ‘श्रेष्ठ बाल कहानियां, ‘दादी की कहानियां¸ नानी की कहानियां, माटी का कर्ज, ‘स्मृतियों का पहाड़, ‘क्षितिज के उस पार, ‘कि भोर हो गई, ‘कान्हा की बांसुरी, ’मिस्टर एम॰ डैनी एवं अन्य कहानियाँ,‘एक था रॉबिन, ‘पर्यावरण बचाओ, ‘नन्हे प्रकाशदीप’, ‘एक सौ एक बालगीत, ’मेरी इक्यावन बाल कहानियाँ, ‘बौगलु माटु त….,‘विदाई, ‘अनुवाद और अनुप्रयोग, ‘प्रयोजनमूलक प्रशासनिक हिंदी, ‘झूठ से लूट’, व मिट्टी का संसार’;’गायें गीत ज्ञान विज्ञान के’ ‘मेरी 51 विज्ञान कविताएँ’ तथा ‘व्यावहारिक राजभाषा शब्दकोश’ आदि प्रमुख हैं। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में आपके साहित्य पर पीएच-डी.तथा एम.फिल. स्तरीय कई शोध कार्य संपन्न हो चुके हैं तथा अनेक विश्वविद्यालयों में वर्तमान में चल रहे हैं ।
आपकी चर्चित पुस्तकों में ‘यादों के खंडहर, ‘टुकडा-टुकड़ा संघर्ष, ‘प्रतिनिधि बाल कहानियां, ‘श्रेष्ठ बाल कहानियां, ‘दादी की कहानियां¸ नानी की कहानियां, माटी का कर्ज, ‘स्मृतियों का पहाड़, ‘क्षितिज के उस पार, ‘कि भोर हो गई, ‘कान्हा की बांसुरी, ’मिस्टर एम॰ डैनी एवं अन्य कहानियाँ,‘एक था रॉबिन, ‘पर्यावरण बचाओ, ‘नन्हे प्रकाशदीप’, ‘एक सौ एक बालगीत, ’मेरी इक्यावन बाल कहानियाँ, ‘बौगलु माटु त….,‘विदाई, ‘अनुवाद और अनुप्रयोग, ‘प्रयोजनमूलक प्रशासनिक हिंदी, ‘झूठ से लूट’, ‘गायें गीत ज्ञान विज्ञान के’ ‘मेरी 51 विज्ञान कविताएँ’ तथा ‘व्यावहारिक राजभाषा शब्दकोश’ आदि प्रमुख हैं। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में आपके साहित्य पर पीएच-डी.तथा एम.फिल. स्तरीय कई शोध कार्य संपन्न हो चुके हैं तथा अनेक विश्वविद्यालयों में वर्तमान में चल रहे हैं ।
आपको उत्कृष्ट साहित्य सृजन एवं उल्लेखनीय हिदी सेवा हेतु देश-विदेश की पचास से अधिक संस्थाओं द्वारा सम्मान/पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।
आपके संपादन में प्रकाशित बहुचर्चित हिंदी पत्रिका ‘विकल्प’ ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने महत्वपूर्ण विशेषांकों के माध्यम से अपनी अलग पहचान अर्जित की है। डॉ॰ चमोला ने भारत सरकार में संयुक्त निदेशक (हिन्दी) सहित विभिन्न सरकारी पदों पर कार्य किया है तथा पूर्व में आप भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून में राजभाषा के प्रमुख रहे हैं तथा वर्तमान में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार में आधुनिक ज्ञान विज्ञान संकाय के पूर्व डीन, कुलानुशासक तथा भाषा एवं आधुनिक ज्ञान विज्ञान के अध्यक्ष हैं । आप गढ़ विहार, फेज-1, देहरादून में रहते हैं ।
डॉ॰ चमोला ने देश के शताधिक विद्वानों के साक्षात्कार लिए हैं। अपने अनेक साक्षात्कार, रचनाओं का प्रसारण देश के 8 दूरदर्शन केंद्रों तथा 12 आकाशवाणी केंद्रों से प्रसारित हुए हैं । आप देश-विदेश की सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं के स्थापित लेखक हैं ।
आपके उपन्यास ‘टुकड़ा-टुकड़ा संघर्ष’ का कन्नड़ भाषा तथा अनेक रचनाओं का विभिन्न भारतीय देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद एवं प्रकाशन हुआ.


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