सीएए के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान देश हित में नहीं है, कौमी एकता से ही राष्ट्र मजबूत रहेगा

asiakhabar.com | March 14, 2024 | 5:06 pm IST
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भारतीय जनता पार्टी ने 2019 लोकसभा चुनाव के समय अपने घोषणापत्र में किये गये एक और वायदे को पूरा कर लिया है। 2024 के लोकसभा चुनाव की दहलीज पर खड़े देश में आचार संहिता लागू होने से कुछ दिनों पहले सीएए के नियमों को अधिसूचित कर दिया है। बीजेपी इसे मोदी की गारंटी बता रही है। 2019 में बीजेपी ने कुछ जो बड़े वादे किये थे उसमें जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म किया जाना, अयोध्या में रामलला के मंदिर निर्माण में आ रही बाधा को दूर करना, तीन तलाक को खत्म करने का कानून बनाना और अब सीएए को भी अमली जामा पहना दिया गया है। सबसे बड़े वादे की बात की जाये तो समान नागरिक संहिता (एनआरसी) को मोदी सरकार पांच वर्षों तक पूरा नहीं कर पाई। अपवाद के रूप में उत्तराखंड में जरूर यूसीसी लागू हो गया है। मोदी सरकार ने जिस तरह से वायदों को पूरा किया है उसके चलते वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद 2024 के आम चुनाव में काफी कुछ बदला गया है, लेकिन दस सालों में मोदी सरकार मुसलमानों को विश्वास नहीं हासिल कर सकी। भाजपा से मुस्लिम मतदाताओं की दूरी का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।बीजेपी को तमाम चुनावों में करीब 8 प्रतिशत मुसलमानों ने ही वोट दिया, लेकिन सरकार इससे संतुष्ट नजर आ रही है। सरकारी नुमांइदे कहते हैं कि देश में जिस तरह से तुष्टिकरण की सियासत को बढ़ावा दिया गया था, ऐसे में बीजेपी के लिये मुसलमानों का दिल जीतना आसान नहीं है। इसीलिये सीएए जैसे कानून की भी मुसलमानों के बीच मुखालफत होने लगती है, जबकि इसका भारत के किसी भी नागरिक से कोई लेना-देना ही नहीं है। सीएए किसी की नागरिकता लेने के लिये नहीं बल्कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने वाला कानून है, जो अपने देशों में अल्पसंख्यक होने के कारण वर्षों से पीड़ित हो रहे हैं।गौरतलब है कि वर्ष 2019 में जब नागरिकता संशोधन बिल लाया गया तो इसके खिलाफ पूरे देश में आंदोलन हुए थे। तब आंदोलन में शामिल मुस्लिमों का मानना था कि यह कानून भेदभावपूर्ण है। इसके तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले गैर मुस्लिमों को तो नागरिकता देने का प्रावधान है, लेकिन मुसलमानों को यह सुविधा नहीं दी गई है। उनके मन में यह बात घर कर गई कि इस कानून से मुसलमानों की नागरिकता भी खतरे में पड़ सकती है। यही वजह रही कि 2019 के बाद हुए राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी मुसलमानों का पहले वाला वोटिंग पैटर्न कायम रहा। वर्ष 2020 में बिहार के विधानसभा चुनाव में 77 प्रतिशत मुस्लिम वोट महागठबंधन को मिले थे। 2021 के पश्चिम बंगाल के चुनाव में 75 प्रतिशत मुस्लिम वोट तृणमूल कांग्रेस को मिले। वर्ष 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में 79 प्रतिशत मुसलमानों ने सपा को वोट किया। इसकी वजह थी कि ये पार्टियां भाजपा के खिलाफ मुसलमानों को बरगलाने में सफल रही थीं।
हालांकि, अब माहौल काफी बदल गया है। अपवाद को छोड़कर तमाम मुस्लिम धर्मगुरु अपनी कौम को यह बता रहे हैं कि वह इस कानून को लेकर किसी तरह का भ्रम नहीं पालें, क्योंकि इससे किसी मुसलमान का कोई नुकसान नहीं होगा। किसी की नागरिकता नहीं जायेगी, लेकिन ओवैसी जैसे नेता जरूर सीएए के नाम पर मुसलमानों को भड़काने में लगे हैं। सीएए को लेकर अधिसूचना जारी होते ही विपक्षी पार्टियों ने भी मुस्लिमों के मन में उठ रही शंकाओं को मुद्दे का रूप देना शुरू कर दिया है ताकि लोकसभा चुनाव में नफा-नुकसान के लिहाज से अपनी रणनीति तैयार कर सकें। इससे कई लोकसभा सीटों पर गैर बीजेपी पार्टियों को फायदा मिल सकता है। बात उत्तर प्रदेश की कि जाये तो यहां करीब 29 लोकसभा सीटें मुस्लिम बाहुल्य हैं। यही वजह है कि भाजपा ने पसमांदा मुस्लिम समाज को साधने के लिए दो साल पहले से तैयारी शुरू कर दी थी। योगी सरकार-टू में पसमांदा समाज के दानिश आजाद अंसारी को राज्यमंत्री बनाया गया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. तारिक मंसूर को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने के साथ विधान परिषद में भेजा गया। यूपी में सहारनपुर, संभल, रामपुर, मुरादाबाद, अमरोहा, कैराना, बरेली, पीलीभीत, बिजनौर, नगीना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, श्रावस्ती, बहराइच, डुमरियागंज, बागपत, बुलंदशहर, अलीगढ़, कैसरगंज, गोंडा, बाराबंकी, बदायूं व आंवला आदि 29 सीटें मुस्लिम बहुल हैं।
इतना ही नहीं स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा ने नगर पंचायत अध्यक्ष, नगर पालिका परिषद अध्यक्ष और सभासद पद पर मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे। पांच नगर पंचायत अध्यक्ष और 90 सभासद एवं पार्षद चुने गए। भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा की ओर से मोदी सरकार के दस वर्ष के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों को केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए शुक्रिया मोदी भाई जान अभियान चलाया जा रहा है। वहीं कौमी चौपाल और स्नेह संवाद के जरिये भी मुस्लिमों के बीच मोदी सरकार की उपलब्धियां पहुंचाई जा रही हैं। यूपी में पीएम आवास में से लगभग 19 लाख आवास मुसलमानों को मिले। 2.61 करोड़ मुस्लिमों को मुफ्त राशन का लाभ मिल रहा है। 2 लाख गरीब मुस्लिमों की शादी में आर्थिक मदद दी गई है। आयुष्मान भारत में 28, किसान सम्मान निधि में 22 और शौचालय निर्माण योजना में 23 फीसदी हिस्सेदारी मुस्लिमों की है।
भाजपा के रणनीतिकार मुसलमानों को समझा रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुसलमानों के लिए सऊदी अरब से आग्रह कर न सिर्फ हज का कोटा बढ़वाया, बल्कि उस पर लगने वाली जीएसटी को 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया। मोदी सरकार ने ही 6 लाख से ज्यादा वक्फ बोर्ड और वक्फ संपत्तियों के कागजातों का डिजिटलीकरण करवाने का काम किया है। वहीं सीएए को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यकारिणी सदस्य एवं लखनऊ की ऐशबाग ईदगाह के इमाम मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने मुसलमानों से कहा कि सीएए पर अधिसूचना जारी होने पर नजरिया पेश करना अभी सही नहीं है। सीएए पर जारी मसौदे के अध्ययन के बाद ही नजरिया पेश किया जा सकता है। उन्होंने जनता से अपील करते हुए कहा कि सीएए को लेकर किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें अमन बनाए रखें।


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